पाकिस्तान में बंदी बनने के बावजूद फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता ने हार नहीं मानी थी

Updated on 11 Oct, 2017 at 9:48 pm

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कारगिल युद्ध को भारतीय सेना के इतिहास में हुए सबसे कठोर युद्धों में से एक माना जाता है। और शायद यही कारण है कि कारगिल युद्ध में साहस और पराक्रम की कई कहनियां बहुत अनोखी हैं। इस युद्ध में कई नायकों ने अतुलनीय वीरता और पराक्रम का परिचय दिया। जहां कुछ के बारे में हम जानते हैं, वहीँ कुछ इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए हैं।

यह कहानी ऐसे ही एक नायक फ्लाइट लेफ्टिनेंट कम्बम्पति नचिकेता की है।

फ्लाइट लेफ्टिनेंट कम्बम्पति नचिकेता उन कुछ फाइटर पायलट्स में से एक हैं, जो दुश्मन के इलाके में फंसने के बावजूद वापस लौटे। 28 मई, 1999 को पाकिस्तानी सेना द्वारा उनका विमान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। पाकिस्तानी सेना ने उन्हें एक हफ्ते तक कैद में रखा। बाद में 4 जून, 1999 को अंतराष्ट्रीय मीडिया के दबाव के कारण उन्हें रिहा किया गया। मिग-27 विमान से बाहर निकलते समय उनकी रीढ़ की हड्डी भी चोटिल हो गई थी। सभी को लगा की अब वह कभी विमान नहीं उड़ा पाएंगे। हालांकि सभी दावों को गलत साबित करते हुए वह अब भी भारतीय वायु सेना में कार्यरत हैं।

सन 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान, 26 वर्षीय कम्बम्पति नचिकेता भारतीय वायुसेना में 9 नंबर दस्ते में सेवा अधिकारी थे। उनका काम था, लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई से खतरनाक मिसाइलें दुश्मन पर दागना।


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27 मई 1999 के दिन, नचिकेता अपने मिग-27 विमान से दुश्मनों के ठिकानों पर हमला कर रहे थे। उन्होंने जैसे ही एक ठिकाने को निशाना बनाकर उसपर 30 एमएम की एक मिसाइल चलाई, उनके मिग-27 विमान का इंजन बंद हो गया। इंजन से चिंगारी और धुआं निकलने लगा।

एक प्रशिक्षित पायलट की तरह उन्होंने हवा में ही विमान के इंजन को फिर से चालू करने की कई कोशिश की, लेकिन इंजन शुरू नहीं हुआ। अंततः नचिकेता को अपने विमान से बाहर निकलना पड़ा। विमान से निकलकर वह पैराशूट द्वारा मुन्थुदालो नामक जगह पर उतरे। यह बर्फ से ढका पहाड़, दुश्मन का इलाका था।

पहाड़ पर उतरने के बाद नचिकेता को आसमान में एक सूक्ष्म बिंदु दिखाई दिया। वह बिंदु उनके साथी पायलट और दल के लीडर अजय आहूजा का मिग-21 विमान था जो की अपने साथी पायलट की खोज में आसमान में मंडरा रहा था। नचिकेता को ज़ोरदार धक्का लगा जब उन्होंने देखा की वो सूक्ष्म बिंदु अचानक ही एक भयानक आग के गोले में बदल गया और आसमान में एक ज़ोरदार धमाका हुआ। एक पाकिस्तानी अंज़ा मिसाइल ने अजय आहूजा के विमान को अपना निशाना बना लिया था।

हादसे के आधे घंटे बाद ही घात लगाए पाकिस्तानी सैनिकों ने नचिकेता पर हमला कर दिया। बहादुर नचिकेता ने भी अपनी वीरता का परिचय देते हुए उनसे डटकर मुकाबला किया। गोलाबारूद ख़त्म हो जाने के बाद नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया और उन्हें रावलपिंडी की कालकोठरी में बंद कर दिया गया। जानकारी लेने के इरादे से पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बहुत यातनाएं दी।



नचिकेता ने अपने एक साक्षात्कार में कहा थाः

“वे मुझे पीट-पीट कर मार डालना चाहते थे, क्योंकि उनके लिए मैं सिर्फ एक दुश्मन पायलट था जिसने हवा से उन पर मिसाइलें चलाईं थीं। भाग्यवश, एक वरिष्ठ अधिकारी वहां आया। वह वरिष्ठ था। उसने स्थिति को समझा कि मैं एक युद्धबंदी हूं और मेरे साथ इस तरह का व्यव्हार नहीं होना चाहिए। एक उम्मीद ज़रूर थी की एक दिन मैं ज़रूर वापस आऊंगा।”

नचिकेता 3 जून, 1999 तक युद्धबंदी रहे। बाद में संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के दबाव के कारण उन्हें पाकिस्तान में इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रॉस को सौंप दिया गया। भारत वापस आने पर जब वह  वाघा बॉर्डर पर मीडिया से मिले तो उन्होंने कहा की वह सिर्फ एक सैनिक हैं, कोई हीरो नहीं और वह अपनी अगली उड़ान भरने के लिए बिलकुल तैयार हैं।

हालांकि, मिग-27 विमान से निकलते समय रीढ़ की हड्डी में चोट लगाने के कारण वह दोबारा लड़ाकू विमान तो नहीं उड़ा सके। बाद में दोबारा प्रशिक्षण लेकर वह भारतीय वायुसेना के परिवहन बड़े में शामिल हुए।

अधिकांश लोगों के लिए यह सब किसी भयानक सपने जैसा हो, मगर हकीकत में ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए बहुत सहस की ज़रूरत होती है। आज नचिकेता, भारतीय वायुसेना में ग्रुप कैप्टन हैं और इल्यूशिन आईएल-78 और एएन-24 जैसे हवा में इंधन भरने वाले विमानों को उड़ते हैं। वह आज भी लड़ाकू विमान की उड़ान को मिस करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि किसी भी रूप में उड़ान भरना उतना ही चुनौतीपूर्ण है।

नचिकेता कहते हैंः

“एक पायलट का दिल हमेशा कॉकपिट में होता है।”

लेफ्टिनेंट कम्बम्पति नचिकेता को कारगिल युद्ध के दौरान उनके अनुकरणीय सेवा के लिए वायु सेना गैलेंट्री मैडल से नवाज़ा गया।


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