पेरिस में रंग जमा रहा है झारखंड की ग्रामीण महिलाओं का हुनर

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8:53 pm 3 Jan, 2017

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कोहबर तथा सोहराई बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में भित्ति चित्र परंपरा का प्राचीनतम उदाहरण है। ये वैवाहिक उत्सव में बनाई जाने वाली लोक कला एवं सांस्कृतिक परंपरा का उदाहरण हैं। अब इसकी धमक और चमक पेरिस तक पहुंच गई है।

हाल ही में पेरिस की एक आर्ट गैलरी में मशहूर फोटोग्राफर डैडी वॉनशावन ने झारखंड के हज़ारीबाग में खींची गई लोकपरंपरा और हुनर को दर्शाती तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई थी। अब इस प्रदर्शनी के माध्यम से इस कला की पूछ विश्व भर में हो रही है।

हज़ारीबाग के बुज़ुर्ग बुलू इमाम जो एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, को आदिवासी महिलाएं ‘पापा’ के नाम से संबोधित करती हैं। बुलू ट्राइबल विमेन आर्टिस्ट कोऑपरेटिव के निदेशक तथा इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज हज़ारीबाग चैप्टर के संयोजक भी हैं। वह पिछले तीन दशकों से अधिक वक्त से इस कला को मुकाम देने की कोशिशों में जुटे हैं। यही नहीं, इस कला को जीवित रखने के लिए इमाम ने एक संग्रहालय भी बना रखा है।

बुलू इमाम बताते हैं कि इन कलाओं को कई दफ़ा देश-विदेश के छायाकारों ने कैमरे में कैद किए। सुदूर गांवों की महिलाओं ने महानगरों-विदेशों में हुनर की नुमाइश भी की हैं, पर वॉनशावन ने पहली दफ़ा बिल्कुल अलग और ख़ूबसूरत अंदाज़ में इसे पेश किया है, जिस पर पूरी दुनिया की नज़रें हैं।


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पेरिस की एक आर्ट गैलरी में मशहूर फोटोग्राफर डैडी वॉनशावन ने हज़ारीबाग में खींची इन्हीं तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई थी.bbci

बता दें, कोहबर तथा सोहराई झारखंड और बिहार की जनजातीय कला हैं। हालांकि, दूसरे समुदायों की महिलाएं भी इस हुनर की मुरीद हैं। यह जनजातीय कला हजारों साल पुरानी है। मिर्जापुर में यह पाषाण युग से और हजारीबाग (झारखंड) में यह शैली कांस्य युग से मौजूद हैं।

हजारीबाग के बुलू इमाम को आदिवासी महिलाएं पापा कहकर बुलाती हैं.bbci

इमाम बताते हैं कि सालों पहले इस कला के प्रति उनका रुझान बढ़ा। इसके लिए उन्होंने इस संबंध में पढ़ना-लिखना शुरू किया। वर्ष 1990 में छह महिलाओं को लेकर एक संगठन बनाया, फिर कपड़े, कागजों के साथ दीवारों पर उनकी मेहनत को मांजा। अब ढाई से तीन सौ महिलाएं सीधे तौर पर सरकारी-ग़ैर सरकारी स्तर पर इस काम से जुड़ गई हैं।

पेरिस तक में अपनी छाप छोड़ रही इस जनजातीय कला के सफ़र के संबंध में इमाम बताते हैं कि वॉनशावन चार सालों के दौरान चार बार हजारीबाग के दौरे पर आई थीं और इस जनजातीय परंपरा और महिलाओं के हुनर से काफ़ी प्रभावित थीं। वे अपने संग्रहालय के पास एक कच्चे घर की दीवारों पर आकृतियां दिखाते हुए कहते हैं कि पेरिस की प्रदर्शनी में यह भी शामिल है।

ज़ाहिर है इन कलाओं को सहेजने और पेरिस तक पहुंचाने में इमाम के पूरे परिवार ने बड़े जतन किए हैं। उन्हें अफ़सोस है कि झारखंड में कला को लेकर कोई अकादमी नहीं है। इस हुनर के ज़रिए ग्रामीण महिलाओं में रोज़गार के अवसर बढ़ें। इसके लिए सरकारी प्रयास बेहद जरूरी है। इन कलाओं में पशु-पक्षी प्रेम, डोली पर जाती दुल्हन, राजा-रानी, फसलों की बुवाई-कटाई समेत कई आकृतियां दीवारों पर उकेरी जाती हैं।

आपको याद दिला दें कि हज़ारीबाग दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां की दीवारों पर इस कला को देख मुरीद हुए थे। इसके बाद अपने ‘मन की बात’ में चर्चा भी की थी कि किस तरीके से गांवों की आदिवासी महिलाओं ने दीवारों को सजाया-संवारा है। अब मोदी की सराहना के बाद झारखंड की राजधानी रांची में भी सरकार यह काम करवा रही है। इसके ज़रिए ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसर मुहैया होने लगे हैं।

लोकसंस्कृति और जनजातीय परंपरा को जीवित रख उसकी विश्वस्तर पहचान दिलाने का यह प्रयास सराहनीय है। इससे जहां अपनी संस्कृति के जड़ों को और मजबूती मिलती है, वहीं इससे आदिवासी महिलाओं को अपने हुनर दिखाने का भी अवसर प्राप्त होता है।


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