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जल्लीकट्टूः आखिर हिन्दू परंपराओं में ही खोट क्यों नजर आती है ?

Published on 19 January, 2017 at 5:32 pm By

पोंगल के अवसर आयोजित किए जाने वाले लोकप्रिय खेल जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को लेकर तमिलनाडु में प्रदर्शन जारी है। चेन्नई के मरीना बीच पर जहां पिछले मंगलवार से हजारों की तादाद में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं राज्य के अलग-अलग इलाकों में इसके समर्थन में माहौल गर्म है।

लोगों की मांग है कि न केवल जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को हटाया जाए, बल्कि कथित तौर पर पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करने की मांग की गई है, जिनकी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने जल्लीकट्टू को प्रतिबंधित कर रखा है।

इस मामले को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम ने गुरुवार को ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की।

हालांकि, प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर यह कहते हुए दखल देने से इन्कार किया है कि यह मामला अदालत में विचाराधीन है। साथ ही यह भी कहा कि अध्यादेश के मामले में वह राज्य सरकार के साथ है।


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आप निश्चित रूप से जानना चाह रहे होंगे कि जल्लीकट्टू आखिर है क्या? इस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद आखिर यह सुर्खियां क्यों बटोर रहा है? तमिल भाषा में जल्ली’ शब्द दरअसल ‘सल्ली’ शब्द का अपभ्रंश है। इसका शाब्दिक अर्थ है, ‘सिक्के’। औऱ कट्टू का शाब्दिक अर्थ होता है ‘बांधा हुआ’। जल्लीकट्टू एक खेल है, जिसमें सांडों की भूमिका प्रमुख होती है। खेल के दौरान सांड की सींग पर एक कपड़ा बांधा जाता है, जिनमें सिक्के होते हैं। खेल में हिस्सा लेने वाले लोगों की कोशिश होती है कि वे इस कपड़े निकालें। अगर कोई खिलाड़ी सांड की सींग पर लगे इस कपड़े को निकाल लेता है तो उसे विजेता घोषित किया जाता है।



कथित तौर पर पशुओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए काम करने वाली संस्था पेटा तथा अन्य सगंठनों ने इस खेल को सांडों के लिए हानिकारक बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिकी थी। इन संस्थाओं का कहना था कि यह खेल इसमें हिस्सा लेने वाले जानवरों पर अत्याचार है। इस खेल को खतरनाक बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में इसे प्रतिबंधित कर दिया।

करीब 4 सौ साल पहले यह खेल प्रचलन में आया था। तब से यह खेल तमिलनाडु की सांस्कृतिक परम्परा में रचा-बसा रहा है। यही वजह है कि तमिलनाडु की जनता इसे अपने संस्कृति का अहम हिस्सा बताते हुए प्रतिबंध को वापस लेने की मांग कर रही है।

अब सवाल यह उठता है कि अगर यह खेल खतरनाक है खेल के नियमन को लेकर नियम बनाए जा सकते हैं, लेकिन इस तरह किसी परंपरागत संस्कृति को अस्वीकार करना कहां तक सही है? इस खेल को सांडों की नस्लों की रक्षा और उन्हें उन्नत करने से भी जोड़कर देखा जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि जल्लीकट्टू के खेलों में सांडों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता, जैसा कि आमतौर पर स्पेन के बुलफाइटिंग के दौरान होता।

सिर्फ जल्लीकट्टू ही नहीं, पिछले कुछ सालों में हिन्दू परम्पराओं के नाम पर खोट निकालने का एक चलन सा हो गया।

रंगों के खेल होली से ऐन पहले पानी बचाने की कैम्पेनिंग शुरू हो जाती है, तो दिवाली से ऐन पहले प्रदूषण को रोकने के नाम पर पटाखों को प्रतिबंधित करने की मांग शुरू होती है। जबकि सभी जानते हैं कि होली की वजह से न तो पानी की कमी होती है और न ही दिवाली की वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कृष्ण जन्माष्टमी के दिन दही हांडी के खेल की ऊंचाई निर्धारित की थी, जिसका समाज में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था। हिन्दू समुदाय को नीचा दिखाने वाले ऐसे ढेर दृष्टान्त मौजूद हैं, जिन्हें हिन्दू परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत पर कुठाराघात माना जाना चाहिए। कुल मिलाकर कैम्पेनिंग का ताना-बना कुछ ऐसा बुना जाता है कि हिन्दू अपनी परंपराओं से दूर हों। उन्हें अपनी परंपराओं में खोट नजर आए।

यह आश्चर्य ही है कि पेटा जैसे संगठनों को धर्म के नाम पर एक दिन ही में करोड़ों बकरे, गाय ऊंटों की कुर्बानी नहीं दिखती। क्या इसे जानवरों पर अत्याचार नहीं माना जाना चाहिए? इन करोड़ों जानवरों की कुर्बानियों की तुलना जल्लीकट्टू से नहीं हो सकती, क्योंकि जल्लीकट्टू में जानवरों पर हिंसा का कोई स्थान नहीं है। इसका उल्लेख पेटा जैसे संगठनों को यह याद दिलाना भर है कि जानवरों पर असल में अत्याचार किसे कहते हैं।

साधदुरु पूछते हैं।

श्रीश्री रविशंकर भी जल्लीकट्टू के समर्थन में उतर आए हैं।


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