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‘तुमने बहुत अच्छा किया एरोम शर्मिला, युद्ध कभी भूखे पेट नहीं लड़े जाते’

Published on 27 July, 2016 at 5:57 pm By

इससे पहले कि मेरी आवाज़ ख़त्म हो,

दो मुझे आँधियारे का उजाला..

है सफ़र कई वर्षों का लंबा,

और आग फिर भी जल रही है..

यह आवाज न तो सरकार के खिलाफ है और न ही सेना के खिलाफ। और एक हद तक न ही अस्फ़ा के, क्योंकि इनके खिलाफ निकली हर आवाज़ हमेशा ही एक जंग के रूप में जन्म लेती है। और हम एक आम आदमी, जिसको ज़िंदगी जीने के लिए भी रोज़ एक जंग में मरना पड़ता है, वह ऐसे जंग की कल्पना भी नहीं कर सकता, जो उसके खुद अपनों के खिलाफ हो। यह आवाज है खुलकर सांस लेने के लिए, कोई ख्वाब चुनने के लिए फिर उसे शांति के धागे में पिरो कर बुनने के लिए। यह आवाज़ है, हम जैसे आम इंसान की, जिसका पंख फैला कर खुले आसमान में महकने का सपना, खून बनकर सड़कों पर बह जाता है। यह आवाज़ है डर से खामोश होती आंखों की, कांपते नन्हे हाथों के उंगलियों की। यह आवाज़ हर उस शख़्स के खिलाफ है, जो इंसानियत के फुलवारी में हथियार लिए खड़ा है। यह आवाज़ है, हर उस फूल की, जिसे बेखौफ़ खिलना है, महकना है, जीना है। और इस आवाज़ का नाम है ‘एरोम शर्मिला’।


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irom sharmila

4 नवंबर सन 2000 यह वही तारीख है, जब 28 साल की एरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरू की थी। इसके ठीक दो दिन पहले मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शांति रैली के आयोजन के सिलसिले में एरोम शर्मिला बैठक कर रही थी। और उसी दौरान मलोम बस स्टैंड पर सुरक्षाबलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं गईं, जिसमें करीब दस लोग मारे गए।

ऐसा नहीं था कि इस तरह की यह पहली घटना थी। लेकिन शर्मिला के लिए यह ‘दमन का चरम’ था। उन्होने उस दिन हथियारों को इंसानियत से जीतते देखा था। फिर शर्मिला ने जो लौ जलाई, उसे आप इस दुनियां, इस इंसानियत का यथार्थ भी कह सकते हैं। हो सकता है उस वक़्त लोगों को यह लगा हो कि एक युवा नेत्री ने भावुकता में बहकर यह कदम उठा लिया है। पर जब आज इस तस्वीर को 16 साल के बाद भी देखते हैं, तो यह मात्र भावुकता के फ्रेम में जर्जर और कमजोर होती काया नहीं दिखती, बल्कि इरादों से मजबूत होती संघर्ष की सच्ची कहानी दिखती है।

अब वही 28 साल की युवा शर्मिला 44 साल की हो चुकी हैं और उन्होंने सरकारों की उदासीनता को देखते हुए यह ऐलान किया है कि आने वाले 9 अगस्त को वह अपना 16 सालों से चल रही भूख हड़ताल तोड़ेंगी। और इस जंग को एक कदम और आगे बढ़ते हुए जनता के बीच आकर चुनाव लड़ेंगी।

irom sharmila



एक तरह से अापने ठीक भी किया शर्मिला क्योंकि मेरा भी मानना यही है कि युद्ध भूखे पेट नहीं लड़े जाते। पर अगर बात जनता के बीच आने की ही है, तो उन्हें यह भी समझना होगा कि यह युद्ध किसी सरकार, किसी सैनिक या किसी क़ानून से नहीं है। यह युद्ध सिर्फ़ उन विचारों के कारीगरों से हैं, जिनको लगता है कि हथियार अमन ला सकता है। जिनको लगता है इंसान को मारकर वे उनके विचारों का भी दमन भी कर सकते हैं।


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दरअसल, यह युद्ध उनके खिलाफ है, जिनको यह नहीं पता कि उनके बंदूक से निकली गोली, चाहे वो अपराधी के खिलाफ हो, या किसी बेकसूर के खिलाफ, विनाश सदैव मानवजाति का ही होना है। ख़तरे में हमेशा इंसानियत ही रहेगी।

मुझे यकीन है एक दिन हम जागेंगे और उस दिन, आपने जो इंसानियत के इंसाफ़ के लिए लौ जलाई है, वह मशाल बन कर दुनिया में रोशनी बांटेगी। अभी तो उसे आग होना बाकी है। यह भूख हड़ताल जो संघर्ष की एक अभिनव गाथा है, उसे तो अभी और तपना है। उन सभी हथकड़ियों, ज़ंज़ीरों, सलाखों को नष्ट करना है, जो सभ्यता का कत्ल करके पाषाण युगीन मानसिकता को जन्म देती हैं। और यही नहीं भूख आज़ादी की, भूख इंसाफ़ की, भूख सबको गले लगा कर अपनाने की, हमेशा ज़िंदा रखना है। और इस भूख को अभी हर दिल में उतरना बाकी है।

irom sharmila

यह लौ तब तक जलती रहेगी, जब तक कि यह यकीन न हो जाए कि हमारे पैर उनके साथ कदम मिला कर हर सरहदों को नष्ट करने के लिए खड़े हैं। ये आंखें भय नहीं, बल्कि उनकी आंखों में आंखें डाल कर इस दुनिया को अमन और शांति का रास्ता दिखाने के लिए खुले हैं। यह जो आज़ादी के पंख हैं, वे किसी पिंजरे में क़ैद होकर फड़फड़ाने के लिए नहीं, बल्कि बेखौफ़ आसमान में उड़ान भरने के लिए हैं।


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मुझे यकीन है कि यह संघर्ष, यह जंग, यह लौ, यह आवाज़, यह भूख तब तक यूं ही चलती रहेंगी, जब तक उन्हें यह एहसास न हो जाए कि इस दुनिया को ख़तरा इंसानों से नहीं, बल्कि इसको चलाने वालें हथियारों से है। जब तक एक भी हाथ में बंदूक रहेगी, चाहे वह हाथ किसी आतंकी का हो या सैनिक का- ख़तरा सिर्फ़ मानवजाति को ही रहेगा। दुनिया की हर बंदूक सिर्फ़ और सिर्फ़ आदमी को मारने की नीयत से ही बनाई जाती है।

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