IRCTC क्यों नहीं देता ट्रेन में सीट चुनने का विकल्प, वजह दिलचस्प है

Updated on 20 Dec, 2017 at 4:23 pm

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बस हो या ट्रेन अधिकतर लोग यही चाहते हैं कि उन्हें विंडो सीट ही मिले, ताकि खिड़की से बाहर झांकते हुए वो सफर का मज़ा ले सकें। लेकिन ट्रेन के मामले में विंडो सीट आपकी चॉइस पर निर्भर नहीं करता, क्योंकि बुकिंग के समय अपनी पसंद की सीट लेने का विकल्प नहीं होता है। कई बार आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा कि टिकट बुक कराने के बाद पता चला कि आपको मिडल वाली सीट मिल गई है, ऐसे में रेलवे को दो-चार बातें सुनाने के अलावा आपके पास कोई चारा नहीं होता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब सिनेमाहॉल में हम अपनी पसंद की सीट चुन सकते हैं, तो ट्रेन में क्यों नहीं?

दरअसल, रेलवे में सीट बुकिंग के दौरान कई चीज़ें मायने रखती हैं। आपको यह जानकर हैरान होगी की रेलवे का टिकट बुकिंग सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि वह सभी कोच में एक समान लोगों की ही बुकिंग करता है।

ट्रेन में स्लीपर क्लास एस1, एस2, एस3, एस4…. आदि क्रमांक में होते हैं। हर कोच में 72 सीटें होती हैं। जब आप सबसे पहले टिकट बुक करते हैं तो रेलवे का सॉफ्टवेयर आपको मिडल कोच यानी एस5 में कंपार्टमेंट के मिडल में सीट नं. 30-40 के बीच की कोई लोअर सीट अलॉट करेगा। क्योंकि रेलवे पहले लोअर सीट अलॉट करता है और बैलेंस बनाने के लिए उसके बाद अपर सीट, मिडल सीट का अलॉटमेंट बाद में होता है।

जब आप आईआरसीटी के ज़रिए बुकिंग करते हैं तो सॉफ्टवेयर पहले ये चेक करता है कि सभी कोच में एक समान संख्या में पैसेंजर्स हैं या नहीं और मिडल से होते हुए गेट के पास वाली सीट तक अलॉट की गई है या नहीं। साथ ही सीटें पहले लोअर से अपर बर्थ के हिसाब से बुक की गई है या नहीं। यानी पहले लोअर बर्थ, फिर मिडल और उसके बाद अपर बर्थ अलॉट होना चाहिए।

ऐसा करने के पीछे रेलवे का मकसद सभी कोच में बैलेंस बनाए रखना होता है। शायद अब आप समझ गए होंगे कि आखिरी में टिकट बुक करने पर आपको अपर बर्थ ही क्यों मिलता है।

यदि बेतरतीब ढंग से रेलेव बुकिंग करे तो?


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ज़रा सोचिए यदि अपनी वर्तमान बैलेंस वाले सिस्टम को छोड़कर रेलवे बिना सोचे-समझे किसी भी कोच में बेतरतीब ढंग से बुकिंग करने लगे तो क्या हो। मान लीजिए ट्रेन में एस1, एस2, एस3 कोच पूरी तरह से भर चुके हैं, जबकि एस5 और एस 6 खाली हैं। उसमें गिनती के पैसेंजर हैं. ऐसी स्थिति में जब ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से चलेगी और मुड़ेगी तो पीछे वाले खाली डिब्बों के डिरेल (पटरी से उतरने) होने का खतरा रहता है, क्योंकि उसका वज़न कम है।

तकनीकी कारण…

सीट बुकिंग में तकनीकी कारण भी मायने रखता है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता हो तो सभी कोच में यदि समान यात्री नहीं होंगे तो कोच का वज़न भी अलग-अलग होगा। ऐसे में ट्रेन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

प्रोफाइल भी मायने रखती है

टिकट बुकिंग के समय नाम, उम्र, जेंडर आदि डिटेल भरनी होती है। इसके आधार पर भी सीटें अलॉट की जाती हैं। जैसे बुज़ुर्ग महिला, प्रेग्नेंट महिलाओं को लोअर बर्थ दी जाती हैं।

उम्मीद है अब आप समझ गए होंगे कि रेलवे सीट चुनने की सुविधा क्यों नहीं देता, क्योंकि अगर लोग अपनी मर्जी से सीट चुनने लगें तो ट्रेन का बैलेंस बिगड़ सकता है जो सुरक्षा के लिहाज़ से खतरनाक है।

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