ईरान पर ट्रम्प के फैसले से अछूता नहीं रहेगा भारत, ये हो सकता है असर

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Updated on 12 May, 2018 at 1:22 pm

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ट्रम्प प्रशासन ने आखिरकार ईरान से परमाणु समझौता तोड़ने का ऐतिहासिक फैसला कर लिया है। इस फैसले के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ ताजा प्रतिबंधों वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए। साथ ही दुनिया को आगाह किया कि जो भी देश ईरान की मदद करेगा, उसे भी प्रतिबंध झेलना पड़ेगा। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी ने साथ मिलकर वर्ष 2015 के जुलाई महीने में ईरान से समझौता किया था। इसके तहत ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करना था। ईरान ने वादा किया था कि वह अपने परमाणु संयंत्रों को निगरानी के लिए खोलेगा। इसके बदले में ईरान को बड़ी आर्थिक मदद की गई और प्रतिबंधों में आंशिक रियायत भी। अब डोनाल्ड ट्रम्प का आरोप है कि ईरान ने इस समझौते की कद्र नहीं की है और दुनिया से छिपकर अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा है।

 

भारत पर असर

हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब से अपने संबंधों को मजबूत किया है। खास बात यह है कि ये तीनों देश ईरान को पश्चिम एशिया के लिए खतरा मानते रहे हैं। हालांकि, नई दिल्ली ने सफलतापूर्वक न केवल इन तीनों देशों को साधा, बल्कि तेहरान से भी अपने संबंधों को एक नई दिशा दी। अब यह तय है कि ईरान के साथ परमाणु समझौते से अमेरिका का पीछे हटना भारत के लिए चुनौती पेश करेगा। यह भारतीय विदेश नीति के लिए अग्नि-परीक्षा सरीखा साबित हो सकता है।


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ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ परमाणु समझौता कर उसके आर्थिक अलगाव पर एक हद तक अंकुश लगाने का काम किया था। इस वजह से भारत को भी तेहरान के साथ सामरिक और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने का मौका मिला। इसी साल के फरबरी महीने में ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी अपने तीन-दिवसीय भारत दौर पर आए। यह पिछले 10 साल में किसी ईरानी राष्ट्रपति का पहला भारत दौरा था। इस दौरान चाहबार बंदरगाह के विकास सहित 9 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। रुहानी के इस दौरे से ईरान-भारत संबंधों की एक नई पटकथा लिखी जा रही थी।

 

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ईरान

भारत के लिए ईरान न केवल कच्चे तेल का एक प्रमुख स्रोत है, बल्कि यह भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ईरान का इस्तेमाल दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ करता है। चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के तहत चीन ग्वादर बंदरगाह का विकास कर रहा है, तो वहीं भारत ईरान के चाहबार में रहकर चीन और पाकिस्तान के प्रभाव को कम करने की जुगत में है। चाहबार बंदरगाह के जरिए भारत के लिए अफगानिस्तान सहित मध्य एशिया के अन्य देशों में माल पहुंचाना आसान हो रहा है। हाल ही में भारत ने इसी बंदरगाह का उपयोग करते हुए अफगानिस्तान को गेंहूं की पहली खेप भेजी थी। चाहबार के विकास पर भारत करीब 500 मीलियन डॉलर खर्च करेगा। इसमें निवेश की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।



इतिहास गवाह है भारत ने इस अशांत क्षेत्र में अपने हितों को साधते हुए संतुलन बनाए रखा है। हालांकि, नई परिस्थितियां भारत के अनुकूल नहीं हो सकती हैं और यह भारतीय विदेश नीति के लिए कठिन समय हो सकता है। अमेरिका के परमाणु समझौते से अलग होने के बाद अब ईरान के प्रभाव से निपटने के लिए सऊदी अरब और इजराइल नई रणनीति पर काम करेंगे। इन परिस्थितियों में भारत को चाहबार में अपने निवेश को सीमित करना पड़ सकता है, ताकि अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब से संबंध बने रहें। हालांकि, इसके अपने खतरे हैं, जो पिछले कुछ समय से दिख रहे हैं।

 

 

वाशिंग्टन, तेल अवीव और रियाध से नई दिल्ली की बढ़ती नजदीकी पर ईरान की नजर रही है। मार्च महीने में ईरान के विदेश मंत्री जावेद जारिफ ने पाकिस्तान को चाहबार के विकास के लिए आमंत्रित किया था। साथ ही चाहबार और ग्वादर को जोड़ने की बात कही थी। परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने के बाद ईरान अपने दरवाजे पाकिस्तान के लिए खोल सकता है। इससे चीन के लिए भी ईरान तक पहुंच आसान हो जाएगी। ईरानी कच्चे तेल का चीन सबसे बड़ा आयातक देश है। अपने बीआरआई योजना के तहत ईरान को चीन आर्थिक सहायता मुहैया करा सकता है। इस धूरी में जल्दी ही रूस भी शामिल हो सकता है।

अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक तक आसानी से पहुंचने के लिए भारत का ईरान से बेहतर संबंध जरूरी है। यह इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान की मदद करने वालों को भी प्रतिबंध झेलना पड़ेगा। लिहाजा, भारत को इस अशांत क्षेत्र में अब सोच-समझकर आगे की कार्रवाई करनी होगी।


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