इन्टरनेट के दौर में साहित्य के प्रति बढ़ा है लोगों का रुझान, ‘खुरचनभाइक कछमच्छी’ है सबूत

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6:32 pm 20 Feb, 2017

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इन्टरनेट के इस दौर में यह शिकायत आम है कि लोग पढ़ना नहीं चाहते। साहित्य के प्रति लोगों की रुचि कम हुई है और साहित्य पहले की तरह लोगों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं करता। पढ़ने के प्रति लोगों की रुचि कैसे जगे, इस पर गाहे-बगाहे बहस भी छिड़ती रही है। हालांकि, साहित्य की दुनिया में मौजूद कथित संक्रमणकाल के इस दौर में ऐसे लेखक भी मौजूद हैं, जो इन्टरनेट को हथियार बनाकर पाठकों में पुस्तकों के प्रति रुचि को जगाने की मुहिम छेड़े हुए हैं। ये लेखक युवा हैं, साथ ही तकनीक से लैस भी। ये पाठकों से सीधा संवाद करने के लिए फेसबुक और ट्वीटर का इस्तेमाल करते हैं।

रुपेश त्योंथ उर्फ नवकृष्ण ऐहिक, इन्हीं रचनाधर्मियों में एक हैं, जिन्होंने मैथिली भाषा, साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए इन्टरनेट का बखूबी इस्तेमाल किया है।

साहित्यकार रुपेश त्योंथ उर्फ नवकृष्ण ऐहिक।

मैथिली साहित्य के उदीयमान नक्षत्र कहे जाने वाले रुपेश त्योंथ का व्यंग्य संग्रह ‘खुरचनभाइक कछमच्छी’ इन दिनों मैथिली जगत में चर्चा का विषय है।

खुरचनभाइक कछमच्छी।

मैथिली में ऐसा कम ही होता है कि किसी पुस्तक के प्रकाशन के साल भर बाद भी उस पर चर्चा हो रही हो। ‘खुरचनभाइक कछमच्छी’ ने इस वर्जना को तोड़ा है। विविधता से भरपूर यह व्यंग्य संग्रह अपनी भाषा, शिल्प, वाक्य-विन्यास, शैली, कथा के परिवेश की वजह से पाठकों की वाहवाही बटोर रहा है। इस व्यंग्य संग्रह का पहला संस्करण हाथों-हाथ लिया गया और अब इसका दूसरा संस्करण छपने के लिए तैयार है। ‘खुरचनभाइक कछमच्छी’ सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक बन गई है। इस पुस्तक के लिए रुपेश को मैथिली साहित्यिक व सांस्कृतिक समिति की तरफ से नव हस्ताक्षर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

टॉपयाप्स से बातचीत के क्रम में रुपेश त्योंथ कहते हैंः

“साहित्य के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने में इन्टरनेट कारगर है। पाठकों से सीधे संवाद का मौका मिलता है। मुझे मैथिली साहित्य का भविष्य बेहतर दिखाई देता है।”


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वरिष्ठ साहित्यकार मिथिलेश कुमार झा अपनी समीक्षा में खुरचनभाइक कछमच्छी को मैथिली व्यंग्य की विधा में एक उपलब्धि करार देते हैं।

समीक्षा में मिथिलेश कुमार झा लिखते हैंः

“एहि व्यंग्य संग्रहक मादें कहि सकैत छी जे मैथिली व्यंग्यक ई एकटा उपलब्धि थीक। एकर भाषा, शिल्प, शब्द, वाक्य-विन्यास, कथाक परिवेश, कथोपकथनक शैली आदि दृष्टिएं ई मिथिला समाजक लग मे अछि त’ विषयक दृष्टिएं एहि मे विविधता छै। दरबज्जा, टोल, गाम, समाज, प्रदेश सं होइत राष्ट्र आ विश्वक चिंतन एहि मे छै। मैथिलक उकठपना छै, गप्प मारबाक प्रवृत्ति छै, बाट छेकबाक प्रकृति छै आ एहि सभटापर व्यंग्य क’ ताहि सं उप्पर उठबाक लक्ष्य छै। समस्त रचना शीर्षक सं अंत धरि संपूर्ण अर्थ मे व्यंग्य अछि।”

‘एक मिसिया’ कविता संग्रह युवा साहित्यकार रुपेश त्योंथ की पहली रचना है। इस कविता संग्रह को भी उल्लेखनीय सफलता मिली थी।

आईटी फील्ड से जुड़े रुपेश इन दिनों मैथिली साहित्य के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं। कुछ साल पहले रुपेश ने मैथिली साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने के उद्येश्य से कई अन्य साथी साहित्यकारों के साथ मिलकर साहित्यिक परिचर्चा कार्यक्रम ‘अकासतर बैसकी’ से एक नई शुरूआत की। ‘अकासतर बैसकी’ का शाब्दिक अर्थ है मुक्त आकाश के नीचे नीचे बैठक। कोलकाता शहर के अलग-अलग जगहों पर नियमित आयोजित होने वाली इस बैठक में मैथिली के साहित्यकार और आमजन जुटते हैं तथा अपनी-अपनी रचनाओं पर चर्चा करते हैं।

मुक्त आकाश के नीचे अकासतर बैसकी का एक सत्र।

साहित्य की दुनिया में ‘अकासतर बैसकी’ ने एक ट्रेन्ड स्थापित कर दिया है। पटना से लेकर दिल्ली तक सृजनकर्ता अब इस ट्रेन्ड को फॉलो कर रहे हैं।

‘अकासतर बैसकी’ की देखादेखी अब देश के बड़े शहरों में रहने वाले मैथिली प्रेमी अब नियमित तौर पर इस तरह की परिचर्चा का आयोजन कर रहे हैं और मैथिली सैहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।

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