भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने की दिशा में मील का पत्थर है ‘योग दिवस’!

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Updated on 21 Jun, 2016 at 12:04 pm

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आदि काल में जब यूरोप एवं अन्य सभ्यताएं अपने शैशवकाल में थीं, उस समय भारतवर्ष ज्ञान-विज्ञान, कला, संस्कृति, साहित्य परम्परा आदि में सर्वोच्च अवस्था में था। विगत 1000 वर्षों में अनगिनत विदेशी आक्रमणों और आपसी फूट के परिणामस्वरूप ‘भारतवर्ष’ की ‘भारतीयता’ का क्रमिक क्षरण होता रहा, जिसके कारण हम स्वयं ही अपनी विरासतों से अनभिज्ञ से हो गए।

इक्कीसवीं सदी भारतवर्ष के लिए नवपरिवर्तन और पुनर्जागरण काल साबित हो रहा है। विज्ञान और तकनीकी में दक्ष होने के साथ ही भारत ने सदियों से मृतप्राय अपनी ‘महानतम’ सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

 जो योग हम तथाकथित ‘इंडियावाले’ लगभग भुला चुके थे। आज उसी ‘योग’ ने पुनः भारत को नव ‘मान’ दिया है। अपने जीवन के पूर्वार्ध काल को परिव्राज्य की तरह जीने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने यूनाइटेड नेशन में 21 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाने की वकालत की, जिसे 177 देशों ने सहर्ष समर्थन किया।

भोजपुरी में एक काफी प्रसिद्द लोकोक्ति है “सब दिन होए न एक समाना”। संभवतः कालचक्र पुनः घूम कर उसी जगह आ गया है, जहाँ भारत विश्वगुरु की भूमिका में अवस्थित था। आइये आज हमको बताते हैं की कैसे योग दिवस दुनिया द्वारा भारत को पुनः ‘जगतगुरु’ के रूप में अपनाए जाने की दिशा का पहला कदम है !!

1. रूढ़िवादी धारणाओं में जकड़े यूरोप ने भारत सहित लगभग पूरी दुनिया की राजनीति पर कब्जा कर अपनी सभ्यता को थोप दिया, जिसके कारण कई क्षेत्रीय सभ्यताओं का अस्तित्व नष्ट हो गया। गणित की जटिल प्रमेयों (Theorams) से लेकर उच्च भौतिकी और विज्ञान के हजारों सिद्धांतों का वर्णन भारतीय ग्रंथों में भली-भाँति किया गया है। सीधी सी बात है हमारे ही ‘ज्ञान’ का उपयोग हमारे द्वारा न हो कर ‘विदेशियों’ द्वारा किया गया।

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2. प्रधानमंत्री और बाबा रामदेव की जोड़ी ने संयुक्त राष्ट्र तथा समूचे वैश्विक जगत में योग का प्रचार-प्रसार कर भारत की गरिमा विश्वपटल पर अंकित करने में काफी बड़ा योगदान दिया है। कई लोग इसे ‘आडंबर’ और ढोंग से भी जोड़ रहे हैं परन्तु सत्य यही है की यदि उचित समय पर इसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म नहीं मिलता, तो अमेरिका सहित कई अन्य पश्चिमी देश इसका भी ‘पेटेंट’ ले लेते ।

3. बीसवीं सदी भारत के कुछ तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ और अंग्रेजी शासन ने योग को महज व्यायाम और कसरत करार दिया, दुर्भाग्य से भारतीयों ने तथाकथित आधुनिकता में अभिभूत स्वीकृत भी कर लिया। इस तरह ‘योग’ साधुओं और संतों तक ही सीमित हो कर रह गया। पश्चिम के अंधानुकरण के फलस्वरूप योग का स्थान जिम ने ले लिया ।

4. ‘योग’ के प्रणेता महर्षि पतंजली माने जाते हैं, जिन्होंने लगभग 5000 वर्ष पूर्व इसकी रचना की। योग महज शरीर का व्यायाम ही नहीं है,अपितु यह शरीर और आत्मा के मध्य एक सेतु का कार्य करता है।

5. योग विचारों और कर्म को सामंजस्यपूर्ण एकाकार करता है। प्राणायाम मनुष्य को ‘आत्मबोध’ कराता है, जिससे उसके विचारों में गाम्भीर्य और चित्त में शीतलता आती है, फलतः वह जीवन को आदर्श अवसर के रूप में देखता है।

6. आधुनिक युग में मेडिकल साइंस की तरक्की के साथ ही नित नए रोगों का भी अभ्युदय हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम केवल भौतिक जीवन में हम भले ही तरक्की किये जा रहे हैं, परन्तु तनाव, अनियमित दिनचर्या और प्रदूषण ने हमारे सूक्ष्म शरीर को बुरी तरह पीड़ित कर दिया है। मानव से मशीन बने पश्चिमी विश्व के लिए अब सिर्फ भारत ही एक उम्मीद की किरण है।

7. राजनीतिक जीवन में बढ़ रही खाई, व्यक्ति को व्यक्ति से दूर कर रही है। यह होड़ संसार को विनाश की और धकेल रही है। योग परमतत्व में विलीन होने वाली प्रक्रिया है। सिर्फ योग के माध्यम से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना साकार हो सकती है।

8. योग न केवल आपके शरीर को बल्कि समूचे समाज के शुद्धिकरण में सहायक है। समूचा विश्व इस वक्त केवल भारत की ओर राह ताके हुए है,परन्तु अफ़सोस हम भारतीय ही ‘योग’ से इतने दिनों तक अपरिचित बने रहे।

9. ‘योग दिवस’ एक सामजिक परिवर्तन है, जिसने इंडिया को पुनः ‘भारत’ बनाया है। निश्चित रूप से, योग ‘योगा’ के रूप में ही सही, पर हमारी राष्ट्रीय चेतना के जागृतिकरण में प्रमुख भी भूमिका निभा सकता है। यह न केवल हमें स्वस्थ रखता है, अपितु हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर भी दे रहा है।

10. मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही ‘भारत स्वाभिमान’ पर जोर दिया और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ‘मूल’ भारत की छवि को दर्शाने का प्रयत्न किया और कामयाब भी रही। ‘योग दिवस’ एक तरह की डिप्लोमेसी ही है, जिसमे मोदी ने समूची दुनिया में,भारत की संस्कृतनिष्ठ वैज्ञानिक परम्परा का बेहतरीन ‘विज्ञापन’ किया है।

800 वर्ष की गुलामी ने देश को निराशा के गर्त में ढकेल दिया था। हम महज राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी पूर्णतः गुलाम हो गए थे। युगपुरुष स्वामी विवेकानंद जी ने आगामी 100 वर्षों में भारत के विश्वपटल पर ‘जगतगुरु’ के रूप में पुनःप्रतिष्ठित होने की भविष्यवाणी की थी,संयोग से वह समय आ चुका है।

अपने पाठकों से हमारी अपील है, कि योग दिवस को सफलतम बनाने में अपना ‘श्रमसाध्य’ योगदान अवश्य दें और ‘विश्वगुरु’ भारत की ‘कल्पना’ को साकार करने हेतु प्रयास बनाएं रखें।

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