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महाभारत के ‘दानवीर’ कर्ण से जुड़ी ये 8 दिलचस्प बातें आप नहीं जानते होंगे

Published on 24 February, 2018 at 2:54 pm By

महाभारत की जो कहानी आप बचपन से सुनते आए हैं उसके हिसाब से आपके लिए भी अर्जुन और कृष्ण ही नायक होंगे। मगर महाभारत में एक और शख्स था जो न सिर्फ वीर, बल्कि दयावान और कर्तव्यनिष्ठ भी था, लेकिन उसका ज़िक्र कम ही होता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं दानवीर कर्ण की। कुंती पुत्र कर्ण जिसने आखिर सांस तक अपनी दोस्ती का फर्ज़ निभाया। चलिए आज आपको महाभारत के इस नायक के बारे में कुछ ऐसी बातें बताते हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं।

1. कौन था कर्ण?


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कर्ण पांचों पांडव के सबसे बड़े भाई और कुंति के बड़े बेटे थे, बावजूद इसके सारी ज़िंदगी उन्हें सूत पुत्र कहकर अपमान का सामना करना पड़ा।

2. जन्म का रहस्य

 

एक बार ऋषि दुर्वासा कुंति की सेवा से बहुत प्रसन्न हुए और उसे एक मंत्र दिया। ऋषि ने बताया कि वह इस मंत्र के उच्चारण से जिस किसी के भी बच्चे की मां बनना चाहती है वह बन सकती हैं।

ऐसे में कुंति ने ऋषि की बात की सत्यता को जांचने के लिए भगवान सूर्य का स्मरण करते हुए वो मंत्र बोला और इसके परिणामस्वरूप एक कुंडल व कवच धारी बालक का जन्म हुआ। चूकिं कुंति कुंवारी थी तो शर्म से बचने के लिए उन्होंने अपनी इस भूल को छुपाने के लिए बालक को नदी में प्रवाहित कर दिया। उसके बाद एक सारथी की नज़र उस बालक पर पड़ी और वो उसे अपने घर ले आया और उसी ने कर्ण का पालन-पोषण किया।


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3. निस्वार्थ और उदार

 

कर्ण के कवच और कुंडल ने ही उन्हें कुरुक्षेत्र के युद्ध में अजेय बनाए रखा, लेकिन इंद्र ने छल से कर्ण का कुंडल और कवच मांग लिया। इंद्र के छल को जानने के बावजूद उदार कर्ण ने अपना कवच और कुंडल उन्हें देकर अपनी दरियादिली का सबूत दिया। कर्ण ने हमेशा ज़रूरतमंदों की मदद की।

4. वफादारी और दोस्ती

 

घमंडी और अहंकारी दुर्योधन के पास अगर कोई सबसे बेहतरीन चीज़ थी, तो वो थी कर्ण की मित्रता। कर्ण ने दुर्योधन की दोस्ती निभाने के लिए एक-एक करके कई राज्यों पर फतेह हासिल की। दुर्योधन की दुष्टता को जानते हुए भी कर्ण ने अंतिम सांस तक अपनी दोस्ती का फर्ज़ निभाया।



5. अपना वादा पूरा किया

 

कर्ण में इतनी ताकत थी कि वो पांडवों का वध कर सकता था, मगर अपनी मां कुंति को दिए एक वचन के कारण उन्होंने पांडवों को नहीं मारा। जन्म के समय कर्ण को छोड़ देने वाली कुंति ने उससे वचन लिया था कि वो हमेशा पांच भाईयों की ही मां रहेगी, इस वादे को निभाने के लिए कर्ण ने अपनी जान दे दी, मगर पांडवों को कुछ नहीं किया।

6. लालच से दूर

 

जब कुंति ने कर्ण को उनके जन्म की सच्चाई बताई, तो कर्ण से उन्होंने ये भी कहा कि वो पांडवों के बड़े भाई बनकर उनके साथ रह सकते हैं और द्रौपदी का पति भी, मगर कर्ण ने अपनी मां के दिए इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि उसे किसी चीज़ का लालच नहीं था। अंत तक कर्ण दुर्योधन के प्रति वफादार बना रहा।

7. मुश्किलों की समझ थी

 

कर्ण ने जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन में सिर्फ़ कठिनाइयां ही झेली थी। इसलिए वो दूसरों की मुश्किलों को समझता था। कई बार कर्ण को अच्छे काम के लिए भी लोगों की बातें सुननी पड़ती थी।

8. दुख का सामना

 

महाभारत में कर्ण जितना दुख और तकलीफ शायद ही किसी और ने झेला। ईमानदार, वफादार, दयालु, कर्तव्यनिष्ठ होने के बाद भी कर्ण के साथ ऐसा क्यों हुआ? माना जाता है कि इसकी वजह कर्ण के पिछले जन्म के कर्म थे, जिसके कारण उन्हें इतनी मुश्किलों और दुख का सामना करना पड़ा।


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