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1947 में भारत-पाक युद्ध के हीरो रहे ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के बारे में 10 रोचक तथ्य

Updated on 10 September, 2018 at 7:14 pm By

“समय आ गया है झांगर पर कब्ज़े का। ये आसान काम नहीं है, लेकिन मुझे आप सब पर पूरा भरोसा है कि आप अपनी खोई हुई ज़मीन को वापस पाकर फौज का मान बढ़ाएंगे। हम लड़खड़ाएंगे नहीं, हम असफल नहीं होंगे। निडर होकर झांगर की ओर आगे बढ़ो दोस्तों। भारत हर किसी से अपना कर्तव्य पूरा करने की उम्मीद करता है। जय हिंद।”


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ये शब्द थे ब्रिगेडियर उस्मान के पैरा बिग्रेड कॉमरेड्स 50 के लिए साइन किए ऑर्डर में।

 

15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के बीबीपुर में जन्में मोहम्मद उस्मान पुलिस अधिकारी के बेटे थे। उनके पिता चाहते थे कि वह सिविल सर्विस जॉइन करे, लेकिन उस्मान फौज में जाने के अपने फैसले पर टिके रहे। उस्मान बहुत बहादुर और हिम्मती थी। सिर्फ़ 12 साल की उम्र में एक बच्चे को बचाने के लिए वह कुएं में कूद गए थे। उनकी नेतृत्व क्षमता भी गज़ब की थी। तभी तो बहुत कम समय में वह ब्रिगेडियर रैंक तक पहुंच गए। 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नौशेरा और झांगर क्षेत्र को बचाने में उनका अहम योगदान रहा। आइए इनके बारे में बताते हैं कुछ दिलचस्प तथ्य।

 

1. महज 20 साल की उम्र में मोहम्मद उस्मान को प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी, सैंडहर्सट, इंगलैंड में दाखिला मिला। 1932 में एकेडमी गए 10 लोगों में से एक उस्मान थे। रॉयल मिलिट्री एकेडमी का वह आखिरी बैच था, क्योंकि उसी साल देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडमी की शुरुआत हुई।

 


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2. जब उन्हें बलोच रेजिमेंट में कमिशन मिला तब उनकी उम्र 23 साल थी। विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान और बर्मा में वह लड़े। अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक उन्होंने 10वीं बलोच रेजिमेंट की 14वीं बटालियन की कमान संभाली।

 

 

3. मोहम्मद उस्मान ने पाकिस्तानी आर्मी के चीफ बनाए जाने का ऑफर ठुकरा दिया और भारतीय सेना के लिए ही अपनी सेवाएं देते रहे। भारत-पाक बंटवारे के समय पाकिस्तानी नेताओं ने पाकिस्तानी सेना में आने के लिए उनपर बहुत दबाव डाला, मगर वह नहीं माने। जब बलोच रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गई, तब उन्हें डोगरा रेजिमेंट में ट्रांसफर कर दिया।

 

Unsung hero

 

4. ब्रिगेडियर उस्मान को “नौशेरा का शेर” खिताब दिया गया था।

 

जनवरी 1948 में जब पाकिस्तान ने नौशेरा में हमला किया था, तब ब्रिगेडियर उस्मान ने उस हमले का मुहतोड़ जबाव देते हुआ नौशेरा सेक्टर को बचा लिया था। पाकिस्तान को उस लड़ाई में भारी नुकसान हुआ था। उसके करीब 900 सैनिक मारे गए थे, जबकि भारत ने अपने 33 जवान खोए।

 



Mohammad Usman

 

5. नौशेरा सेक्टर पर कब्ज़े के पाकिस्तानी मंसूबों पर जब पानी फिर गया, तब पाकिस्तान ने ब्रिगेडयिर उस्मान का सिर कलम करने वाले के लिए 50 हजार रुपए का इनाम रखा था।

 

Brigadier

 

6.  अपने 36वें जन्मदिन से सिर्फ़ 12 दिन पहले 3 जुलाई 1948 को ब्रिगेडियर उस्मान शहीद हो गए। नौशेरा में हारने के बाद पाकिस्तान ने झांगर पर हमला किया और जबर्दस्त बमबारी की। इसी हमले में ब्रिगेडियर उस्मान शहीद हो गए। उनका पार्थिव शरीर नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया कैंपस में दफनाया गया है।

 

Mohammad Usman

 

7. मरने के पहले उनके आखिरी शब्द थेः “मैं मर रहा हूं, लेकिन इस इलाके को नहीं छोड़ना जिसके लिए हम लड़ रहे हैं।”

 

Hero

 

8. आज तक युद्ध के मैदान में शहीद होने वाले वह भारत के सर्वोच्च रैंक के अधिकारी रहे हैं। आज़ादी के समय भारतीय सेना में कार्यरत 18 ब्रिगेडियर में से वह एक थे। देश के लिए उन्होंने अपनी जान दे दी।

 

Unsung hero

 

9. उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से भी सम्मानित किया गया। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य सम्मान है।

 

 

10. झांगर में ब्रिगेडियर उस्मान के नाम का एक स्मारक बनाया गया। स्मारक उसी पत्थर पर बनाया गया है जहां वह शहीद हुए थे।

 


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