‘स्पेशल चाइल्ड’ गोद लेने के लिए एक ‘पिता’ का कड़ा संघर्ष; सरकार को बदलने पड़े नियम

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Updated on 7 Jan, 2016 at 6:20 pm

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पुणे निवासी 28 वर्षीय आदित्य तिवारी जो एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, का डेढ़ साल से एक स्पेशल चाइल्ड बिन्नी को गोद लेने का संघर्ष आखिरकार ख़त्म हुआ। 

बिन्नी का जन्म 16 मार्च 2014 को हुआ। दरअसल बिन्नी सेहत की कई स्थाई समस्याओं सहित डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त है। वह आंखों और दिल में छेद जैसी गंभीर समस्याओं से पीड़ित है। जिस कारण उसके अपने  मां-बाप ने उसे छोड़ दिया था। तब बिन्नी को मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने अपनी शरण में लिया।

मिशनरीज ऑफ चैरिटी में जब आदित्य की नज़र बिन्नी पर पड़ी तभी उसी क्षण उन्होंने बिन्नी को गोद लेने का मन बना लिया था, उस समय बिन्नी महज़ 6 महीने का था। आदित्य इसके बाद बिन्नी को गोद लेने की सारी कोशिशों में लगे रहे। आदित्य बिन्नी के इलाज़ के लिए लगातार मदद भेजा करते थे।

बिन्नी को अगस्त 2014 में मिशनरीज के इंदौर से भोपाल कैम्पस में शिफ्ट किया गया। तब आदित्य ने इंदौर से भोपाल दर्जनों चक्कर लगाए। आदित्य ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर कई सांसदों को अपनी इस ख्वाहिश के बारे में बताया। कई चिट्ठियां लिखी, हज़ारों मेल किए, कई फ़ोन भी किए, तब जाकर कई कड़े संघर्षों के बाद नए साल में उन्हें बिन्नी सौपा गया। जिसकी खुशी उन्होंने ट्विटर पर जाहिर की।


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आदित्य ने बिन्नी का नया नाम अब अवनीश रखा है। इसी के साथ ही आदित्य देश के पहले ऐसे सिंगल पेरेंट बन गए हैं, जिन्होंने इतनी कम उम्र में बिन्नी जैसे स्पेशल चाइल्ड को गोद लिया है।

आदित्य के बिन्नी को गोद लेने के निर्णय में डटे रहने, उनके कड़े संघर्ष का ही यह नतीजा है कि CARA (केन्द्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण) को अपने नियमों में बदलाव करना पड़ा। जहाँ पहले गोद लेने की उम्र जेजे एक्ट और केंद्रीय दत्तक अभिकरण कारा की गाइडलाइन के तहत 30 साल की थी, अब उसमें पिछले साल अगस्त में परिवर्तन कर सिंगल पेरेंट की उम्र न्यूनतम 25 से 55 साल कर दी गई है।

नियम परिवर्तन के बाद भी गोद लेने की औपचारिकताओं के कारण वर्ष 5 महीने की देरी हुई। आखिरकार 1 जनवरी को आदित्य को बिन्नी की कस्टडी सौंप दी गई। आदित्य इसे एक बड़ी जीत मानते है। आदित्य कहते हैंः

“सिंगल पेरेंट होने के बावजूद बिन्नी की परवरिश के लिए मैं डेढ़ साल से तैयार हूं। नियति ने नए साल का पहला दिन तय किया था। अब वह मेरी जिंदगी है। उसके चेहरे पर मुस्कान ही मेरा मकसद है।”

आदित्य अपने अनुभवों से कहते है कि अभी भी परिवारों और समाज में बच्चों को गोद लेने को लेकर भारी जकड़न है। ऐसे कई बच्चे है जिन्हें अँधेरे भविष्य की ओर छोड़ दिया गया। ऐसे बच्चों को एक परिवार की ज़रुरत है। हमें मूकदर्शक बनके खड़ा नहीं रहना चाहिए। नए साल में ऐसे ज़रूरी बदलावों के लिए हमें सोचने और फैसले करने चाहिए।

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