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‘देख के वीरों की कुर्बानी अपना दिल भी बोला, मेरा रंग दे बसंती चोला’

Updated on 23 March, 2017 at 12:37 pm By

कुछ तो बात है हस्ती मिटती नहीं है उनकी। कुछ लोगों की शख्सियत ही ऐसी होती है कि उनकी हस्ती का गुमनाम होना नामुमकिन है।

क्रांतिकारी शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदव ने साल 1931 में 23 मार्च के दिन देश की आजादी के खातिर हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चुम लिया था।

लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को भगत, सुखदेव और राजगुरु ने अंग्रेज़ पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या कर दी थी।

फांसी चढ़ते वक़्त भगत सिंह की उम्र 24, राजगुरु 23, और सुखदेव 24 साल के थे।

भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ जेल में अपने हक़ की लड़ाई के लिए 64 दिनों की भूख हड़ताल की थी।

bhagat singh

जेल के अंदर बंद भगत सिंह cpim

भगत सिंह ने कहा था “आज दुनिया देखेगी कि भारत के लोग बेज़ुबां नहीं है। उनका खून अभी तक ठंडा नहीं हुआ है। वो अपने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति के लिए तैयार है।”

अपनी बेफिक्र सोच, बेधड़क आलोचना के बारे में भगत सिंह ने लिखा था: “कठोरता से आलोचना करना और आजादी से खुलकर सोचना ही क्रांतिकारी सोच की दो मुख्य विेशेषताएं हैं।”



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