जीते जी अंग्रेजों के हाथ न आने की खाई थी कसम, 20 साल की उम्र में खुद को मार दी गोली

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Updated on 11 Aug, 2016 at 5:18 pm

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हम यहां जिस महान क्रांतिकारी की बात करने जा रहे हैं उसने अपने जीते जी अंग्रेजों के हाथ न आने की प्रतिज्ञा खाई थी।

साल 1888 में जन्मे क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी ने अपने जीते जी अंग्रेजी हुकूमत के हाथों न आने की प्रतिज्ञा निभाई और उनके हाथों आने से पहले ही महज 20 साल की उम्र में ही खुद को गोली मारकर अपनी जान दे दी।

प्रफुल्ल का जन्म 10 दिसंबर 1888 को उत्तरी बंगाल के बोगरा गाँव (अब बांग्लादेश में स्थित) में हुआ था। जब प्रफुल्ल दो साल के थे तभी उनके सिर से पिता का साया छूट गया था। कठिन परिस्तिथियों के बीच उनकी माँ ने उनका लालन-पोषण किया।

स्कूली शिक्षा के दौरान वह स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन के संपर्क में आए। बचपन से ही उनके मन में देश को आजाद कराने की भावना बलवती हो गई थी।

इतिहासकार भास्कर मजुमदार के अनुसार प्रफुल्ल चाकी बंगाल सरकार के राष्ट्रवादियों के दमन के लिए कार्लाइस सर्कुलर के विरोध में चलाए गए छात्र आंदोलन की उपज थे।


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छात्रों के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की वजह से प्रफुल्ल को नौवीं कक्षा में रंगपुर के जिला स्कूल से निकाल दिया गया था। जिसके बाद उन्होंने रंगपुर नेशनल स्कूल में दाखिला लिया जहाँ कई क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर उन्होंने देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करने की क्रांतिकारी विचारधारा का पाठ सीखा।



पूर्वी बंगाल में छात्र आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए क्रांतिकारी बारिन घोष प्रफुल्ल को कोलकाता लेकर आ गए और जुगांतर पार्टी में उनका नाम दर्ज करा दिया। इसके बाद देश को आजाद कराने के पथ पर निकलते हुए वह सिर पर कफन बांधकर जंग-ए-आजादी में शामिल हो गए।

साल 1908 में प्रफुल्ल को अंग्रेज सेना अधिकारी सर जोसेफ बैंफलाइड फुलर को मारने का कार्य सौप गया। लेकिन यह योजना सफल नहीं हो पाई।

प्रफुल्ल कई क्रांतिकारियों को कड़ी सजा देने वाले कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे। उन्होंने अपने साथी खुदीराम बोस के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई।

khudiram bose and Prafulla Chaki

प्रफुल्ल चाकी (बाएं) अपने साथ खुदीराम बोस (दाएं) के साथ campusghanta

दोनों किंग्सफोर्ड को मारने की योजना के तहत मुजफ्फरपुर पहुंचे। खुदीराम और प्रफुल्ल ने 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फ़ेंक दिया। लेकिन गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि दो यूरोपीय महिलाएं सवार थीं।


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इस पूरी घटना के बाद अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गई और उन्हें मोकामा स्टेशन के पास घेर लिया। जिसके बाद अपने आपको जीते जी अंग्रेजी हुकूमत के हवाले न करने की कसम खाए प्रफुल्ल ने खुद को गोली मारकर शहादत दे दी।

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