देश की खातिर अंग्रेजों के हाथ फांसी पर लटक गए ‘पीर अली खान’, नहीं बताया अपने साथियों का नाम

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Updated on 14 Aug, 2017 at 8:52 pm

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पीर अली खान एक ऐसा युवा लड़का, जो अपने घर से भाग खड़ा हुआ और फिर पटना के एक जमींदार नवाब मीर अब्दुल्लाह ने अपने बेटे की तरह उसकी परवरिश की।

पीर अली खान का जन्म 1820 में आजमगढ़ के मुहम्मदपुर में हुआ। पटना में शिक्षा लेते हुए उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और अरबी सीखी। अपनी आजीविका के लिए उन्होंने पुस्तक विक्रेता के तौर पर काम किया।

बाद में वह 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ कई स्वतंत्रता सेनानियों का नेतृत्व कर महान भारतीय विद्रोह की गतिविधियों में शामिल हो गए।

पीर अली खान हिंदुस्तान को अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों से आज़ाद करवाना चाहते थे। उनका मानना था कि गुलामी से मौत ज्यादा बेहतर होती है। उनका दिल्ली के साथ-साथ कई और अन्य स्थानों के क्रांतिकारियों के साथ बहुत अच्छा सम्पर्क था। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि जो भी व्यक्ति उनके संपर्क में आता, वह उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।

उन्होंने जन-जन में, हर वर्ग में क्रांति की भावना का प्रसार किया। जब तक हमारे बदन में खून का एक भी कतरा रहेगा, हम फिरंगियों का विरोध करेंगे, उनसे प्रभावित होकर लोगों ने कुछ इस तरह की कसमें खाईं थीं।

पीर अली खान 3 जुलाई 1857 को अपने साथियों के साथ अंग्रेज़ो के खिलाफ ज़ोरदार नारेबाज़ी करते हुए प्राशासनिक भवन पहुंचे, जहां से पूरे रियासत पर नज़र रखी जाती थी।


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ख़ान और उनके 14 साथियों को 5 जुलाई 1857 को बग़ावत करने के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया।

उस वक़्त पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने पीर अली से कहा ‘अगर तुम अपने नेताओं और साथियों के नाम बता दो तो तुम्हारी जान बच सकती है’, इसका जवाब पीर अली ने बहादुरी से देते हुए कहा :

“जिंदगी मे कई एसे मौक़े आते हैं, जब जान बचाना ज़रूरी होता है, पर जिंदगी में ऐसे मौक़े भी आते हैं, जब जान दे देना ज़रूरी हो जाता है और यह वक़्त जान देने का ही है…।”

अंग्रेजी हुकूमत ने 7 जुलाई, 1857 को पीर अली खान को बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया।

पीर अली खान ने मरते-मरते कहाः

“तुम मुझे फांसी  पर लटका सकते हों, किंतु तुम हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मर जाऊंगा, पर मेरे खून से लाखों बहादुर पैदा होंगे और तुम्हारे जुल्म को ख़त्म कर देंगे।”


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