ब्रिटिश साम्राज्य के मुखर विरोधी थे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, नस्लवाद के खिलाफ उठाई थी आवाज

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Updated on 9 Aug, 2016 at 12:59 pm

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सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक ऐसा नाम है जिन्होंने देश के आजादी आंदोलन में एक नरमपंथी नेता के रूप में ब्रिटिश शासन का मुखर विरोध किया और उनके अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज को बुलंद रखा। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ब्रिटिश राज के दौरान सबसे शुरुआती नेताओं में एक थे।

1900 के प्रारंभिक दशकों में कांग्रेस में बनर्जी ने स्वाधीनता आंदोलन को तेज करने के लिए एक सशक्त जमीन तैयार की।

Surendranath Banerjee

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का जन्म 10 नवम्बर 1848 को कलकत्ता के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह अपने पिता दुर्गा चरण बनर्जी के उदार व उन्नतिशील अवधारणाओं से बहुत प्रभावित थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा परिवार के ही पैत्रिक शिक्षा संस्थान ‘हिन्दू कॉलेज’ से हुई। स्नातक करने के बाद वह इंडियन सिविल सर्विसेज (आईसीएस) की परीक्षा में भाग लेने के लिए लंदन गए। सिविल परीक्षा पास कर लेने के बावजूद, नस्लवाद की वजह से उन्हें काम नहीं करने दिया गया।

उस दौरान देश में लौटकर वह अंग्रेजी के प्राध्यापक बन गए। साथ ही ‘द बंगाली’ नाम से समाचार शुरू किया। 1876 में आनंदमोहन बोस के साथ मिलकर बनर्जी ने इंडियन नेशनल एसोसिएशन बनाया और और ब्रिटिश साम्राज्य के नस्लवाद का कड़ा विरोध किया। इसी के साथ उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले नस्लभेद के खिलाफ देश में घूम-घूमकर सार्वजनिक भाषण देने शुरू कर दिए।

Surendranath Banerjee

wikimedia


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ब्रिटिश साम्राज्य के अत्याचारों के खिलाफ भाषण देने के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया, जिसका देशभर में जमकर विरोध हुआ।



बनर्जी ने हमेशा भारतवासियों के हितों के लिए कानून में बदलाव की मांगें उठाई थीं। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सहित सभी प्रमुख नरमपंथी नेता व्यवस्था के भीतर रहकर बदलाव चाहते थे।

एक जैसा लक्ष्य और मकसद होने के कारण वर्ष 1886 में बनर्जी ने इंडियन नेशनल एसोसिएशन का विलय इंडियन नेशनल कांग्रेस में कर दिया। बनर्जी 1905 के बंगाल विभाजन के पक्ष में नहीं थे, उन्होंने इसका भी विरोध किया।

बनर्जी को ब्रिटिश राजनीतिज्ञ ‘सरेंडर नॉट बनर्जी-अपने पक्ष से नहीं झुकने वाला व्यक्ति’ कहकर पुकारते थे।

देश के लोगों में स्वाधीनता की मांग की अलख जगाने वाले बनर्जी की गिनती देश के लोकप्रिय नेताओं में नहीं थी, किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वह आधुनिक भारतीय राष्ट्रीयता के निर्माताओं में से थे। 6 अगस्त, 1925 को  इस क्रांतिकारी स्वाधीनता सेनानी ने अपनी अंतिम सांस ली।


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