यह है भारत का पहला धुआं रहित गांव; हर घर में है एल.पी.जी. कनेक्शन

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Updated on 9 Dec, 2015 at 9:37 am

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“अब नही होंगी छतें काली और न काले होंगे कोई और फेफड़े”

व्याचाकुराहल्ली गांव की बुजुर्ग ‘रत्नाम्मा’, जब यह वाक्य बोलती हैं, तो जैसे अपने साथ कई पीढ़ियों का मर्म अपने मुस्कुराहट में छुपा ले जाती है। व्याचाकुराहल्ली महिला प्रधान गांव है। खाना पकाने के लिए यहां लड़कियों को पारंपरिक चूल्‍हे पर निर्भर रहना होता है, लेकिन अब रत्नाम्मा को विश्वास है की उनकी आने वाली पीढ़ी के सपने धुआं-धुआं नहीं होंगे।

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सफलता की कहानी “व्याचाकुराहल्ली”।

बेंगलुरू से 77 किलोमीटर दूर स्थित व्याचाकुराहल्ली गांव बन गया है “स्मोकलेस विलेज”। इस गांव में 275 परिवार रहते हैं।


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व्याचाकुराहल्ली देश का पहला गांव है, जिसे ”इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन’ ने अपनी अहम परियोजना “स्मोकलेस विलेज” के लिए चुना था। इस परियोजना के तहत लक्ष्य रखा गया था कि इस गांव के प्रत्येक घर को धुआं-रहित करने के लिए ‘एल.पी.जी.’ कनेक्शन लगवाएंगे। और इस तरह व्याचाकुराहल्ली अब भारत का पहला धुआं रहित गांव बन गया है।

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पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ट्वीट कर यह जानकारी दी।

“व्याचाकुराहल्ली गांव को भारत का पहला धुआं रहित गांव घोषित किया गया है, यहां के समस्त निवासियों को मेरी तरफ से शुभकामनाएं”



 

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हर घर ‘एल.पी.जी.’ हर घर खुशहाली।

“इस ‘स्मोकलेस विलेजस’ का आइडिया महिलाओं के स्वास्थ से संबंधित है , धुएं में निरंतर सांस लेने के कारण और लकड़ी को इर्धन के रूप में प्रयोग करने के कारण इनमें निमोनिया से ग्रसित होने का ख़तरा ज़्यादा है।”

स्मोकलेस विलेजस परियोजना के जनरल मैनेजर मोटी साई वासुदेवन की चिंता साफ झलकती है।

 

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व्याचाकुराहल्ली गांव के हर घर में अब एल.पी.जी. कनेक्शन दे दिया गया है। यहां के ग्रामीणों को इसका सही तरीके से प्रयोग और संबंधित नियमों के लिए भी प्रशिक्षित किया गया है। इससे समस्त व्याचाकुराहल्लीवासी बेहद खुश है, क्योकि पारंपरिक इर्धन पर निर्भर रहने के अलावा इनके पास कोई और चारा नही था। लकड़ी के चूल्‍हे से निकलने वाले धुएं से यहां के निवासियों के सेहत पर प्रभाव पड़ता था।


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