भारत में अब भी मनोरंजन का साधन हैं लोकनाट्य, बदलते दौर में भी लोकप्रिय

Updated on 6 Oct, 2017 at 11:28 am

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रंग बिरंगे कपड़े, मेकअप लगाए, अलग-अलग भाव-भंगिमाओं वाले चेहरे, डायलॉग और डांस के ज़रिए दर्शकों का मनोरंजन करना। यही तो है ट्रेडिसनल फोक थिएटर, जो सदियों से भारत में मनोरंजन का साधन रहा है। बदलते वक़्त के साथ इसकी पहचान थोड़ी धूमिल होती जा रही है। हालांकि, इसके बावजूद आज भी भारत में फोक थिएटर्स यानी लोकनाट्य अपनी जड़े जमाए हुए है।

कोडियाट्म।

यह संस्कृत थिएटर का सबसे पुराना और एकमात्र लोकनाट्य है। इसकी शुरुआत केरल से हुई थी।

यक्षगान।

400 साल पुराना यह लोकनाट्य कर्नाटक में मशहूर है.। पौराणिक कहानियों और महाकाव्य पर आधारित इस लोकनाट्य में कलाकार लुभावने  कॉस्ट्यूम और एनर्जेटिक परफॉर्मेंस से दर्शकों का दिल जीत लेते हैं।


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स्वांग।

यह लोकनाट्य हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बहुत लोकप्रिय है। स्वांग की दो शैलियां महत्वपूर्ण है। एक रोहतक का है बंगरू भाषा में और दूसरा हाथरस का बृजभाषा में।

भांड पाथेर।

यह कश्मीर का मशहूर लोकनाट्य है, जिसमें नृत्य, संगीत और पैरोडी के साथ और भी बहुत सी चीज़ें होती हैं। दिलचस्प बात ये है कि परफॉर्मर जिसे भांड कहते हैं वो ढोल, स्वरनाई और नगाड़ा जैसे खास उपकरणों के साथ नृत्य करते हैं।



जात्रा।

हालांकि, इस लोकनाट्य की शुरुआत बंगाल में 15वीं सदी में हुई थी, लेकिन यह उड़ीसा और बिहार में भी बेहद मशहूर है। यह प्रेम कहानियों पर आधारित होता है और नृत्य के ज़रिए सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता फैलाने का काम करता है।

दशावतार।

यह स्टेज परफॉर्मेंस का एक प्रकार है, जिसमें भगवान विष्णु के 10 अवतारों को दिखाया जात है। यह महाराष्ट्र के कोंकण और उत्तरी गोवा में मशहूर है। इसमें हार्मोनियम, तबला और जंज जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है।

ऐतिहासिक दौर के ये लोकनाट्य अब उतने लोकप्रिय नहीं रह गए जितने किसी ज़माने में हुआ करते थे। हालांकि, बदलते दौर में भी इनकी प्रासंगिकता बची हुई है।


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