कश्मीर के डल झील में मिलने वाले बैक्टीरिया कीटनाशक तक खा सकते हैं!

Updated on 4 Sep, 2018 at 3:00 pm

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डल झील कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ा देता है। दुनिया भर से पर्यटक इस झील को देखने आते हैं और मुग्ध होते हैं। यह झील न केवल कश्मीर की खूबसूरती बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरण प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस झील में कुछ समय से वैज्ञानिकों का एक दल अनुसंधान कर रहा था, जिसने एक बड़ी सफलता हासिल की है।

डल झील में ऐसे जीवाणु मिले हैं, जो कीटनाशक का तक खा सकते हैं!

 

 

इसकी खोज कर रहे वैज्ञानिकों के दल का कहना है कि इन बैक्टीरिया में कीटनाशकों के अवशेषों को अपनाने की प्राकृतिक क्षमता है। यह जल निकायों के अपघटन के बायोमेडिएशन के लिए उपयोगी हो सकता है। शोधकर्ताओं ने कश्मीर घाटी के वातावरण में स्वाभाविक रूप से होने वाले क्लोरोपीरिफोस-प्रतिरोधी बैक्टीरिया की उपस्थिति का भी पता लगाया है।

 

दरअसल, इस क्षेत्र में ऑर्गोफॉस्फोरस कीटनाशक क्लोरोपीरिफोस का व्यापक उपयोग होता है। रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की मानें तो दूषित होने से प्रदूषण को हटाने के लिए माइक्रोबियल सिस्टम का उपयोग हो सकता है। इस बावत अध्ययन को पत्रिका वर्तमान विज्ञान में प्रकाशित किया गया है।

 


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वैज्ञानिकों के अनुसार जल और थल दोनों में ई कोली (ईसी 1) और  स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस (पीएफ 1) पाया है जो क्लोरोपीरिफोस को बायोडिग्रेडिंग करने में पूरी तरह सक्षम हैं। श्रीनगर में डल झील सहित फल के विभिन्न बगीचों में अध्ययन किया गया है जहां स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस मिले हैं। क्लोरोपीरिफोस कीटनाशक स्प्रे के 5 से 10 साल का इतिहास है। रसायन के निरंतर उपयोग के कारण डल झील और सतही मिट्टी को प्रदूषण का खतरा बढ़ता जा रहा है।

 

ज्ञात हो कि कश्मीर घाटी में सेब, नाशपाती, बादाम, अखरोट आदि उगाते हुए कीटनाशकों का उपयोग किया जाना चिंता का कारण बनता जा रहा है। फलतः वैज्ञानिकों ने शोध कार्य किए हैं।

 

 

वैज्ञानिकों के दल में इम्तियाज मुर्तजा, बुशरा, सगीरा शौकत, ओमी लैला, सुमारा मजीद, नेयियाज़ ए दार (शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय), शाह उबायद-उल्लाह (कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय), मुख्तार अहमद (आरसीआरक्यू प्रयोगशाला) और गिरीश शर्मा (एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा) सम्मिलित थे।

 

आशा है जल और मृदा प्रदूषण को रोकने में हम कामयाब होंगें और तभी कश्मीर की वादियों को स्वर्ग बनाए रखा जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ ही संरक्षण को बढ़ावा देना जरूरी है!

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