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आखिर दुनिया के तमाम देश भारतीय आईटी इन्जीनियरों को आने से क्यों रोकना चाहते हैं?

Published on 20 April, 2017 at 6:42 pm By

अमेरिका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जो भारतीय आईटी इन्जीनियरों को अपने यहां आने से रोकना चाहता है। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और अब न्यूजीलैन्ड ने भी अपना रुख साफ करते हुए नई आव्रजन नीतियों की घोषणा की है।


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ब्रिटेन के नए वीजा नियमों के अनुसार, टियर 2 इंट्रा कंपनी ट्रांसफर (कंपनी के भीतर स्थानांतरण) वर्ग के लिए 24 नवंबर के बाद आवेदन करने वालों के लिए अनिवार्य वेतन की न्यूनतम सीमा 30 हजार पाउंड की होगी। पहले यह सीमा 20,800 पाउंड थी। आईसीटी माध्यम का इस्तेमाल अधिकतर ब्रिटेन स्थित भारतीय आईटी कंपनियां करती हैं।

सिंगापुर ने आईटी सेक्टर में काम करने वाले प्रफेशनल्स को वीजा देने पर रोक लगा दी है। वहां की सरकार भारतीय आईटी कंपनियों पर दबाव बना रही है कि अपने यहां वह स्थानीय लोगों को ही काम पर रखें। इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया ने भी विदेशी कामगारों के लिए वीजा 457 प्रोग्राम को रद्द कर दिया है और आगे के लिए शर्तें कड़ी कर दी हैं। न्यूजीलैंड ने भी पेशेवरों को दिए जाने वाले वीजा के नियमों को कड़ा करने की घोषणा की है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो इन देशों के निर्णय से सबसे अधिक प्रभावित भारतीय आईटी पेशेवर होंगे, जो पिछले कुछ समय से विकसित दुनिया में अपना डंका बजा रहे हैं।

भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स पर वीजा नियंत्रण एक नव-आर्थिक दुनिया का संकेत है।



विकसित दुनिया के तमाम देश उन भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स का रास्ता रोकने की तमाम जुगत कर रहे हैं, जो बेहद कम सैलरी के बावजूद मेहनत से काम करते रहे हैं और अपने लिए जगह बनाते रहे हैं। दरअसल, भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को विकसित देश नव-साम्राज्यवादी मानते हैं, और इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए 100 साल पीछे की घटना को समझना जरूरी है।

100 साल पहले तक टेक्सटाइल के क्षेत्र में भारत की तूती बोलती रही थी, लेकिन पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रान्ति के बाद भारत टेक्सटाइल निर्यातक से आयातक की भूमिका में आ गया।

सस्ते निर्माण तकनीक की वजह से न केवल भारत के महंगे टेक्सटाइल उद्योग बर्बाद हो गए, बल्कि यहां का बैकिंग सिस्टम भी इसकी जद में गया, जो इन उद्योगों के लिए वित्त-पोषक का काम करता था।

भारत की आईटी कंपनियां मैनचेस्टर, लंकाशायर और बकिंघम की नई टेक्सटाइल मिल्स हैं। बेहद कम कीमतों में यहां से ऊंची गुणवत्ता वाली सेवा मिलती है। यह अलग बात है कि ब्रिटेन के कारखानों से निकले हुए माल को भारत में खपत होने से रोकने वाला कोई नहीं था, जबकि भारतीय आईटी कंपनियों को लगातार अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है।

श्रम और कम मेहनताना विकसित देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जहां इस तरह की सेवाओं के लिए बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है। भारत में सॉफ्टवेयर इन्जीनियर्स की अधिकता ने इस सेक्टर में सैलरी की ग्रोथ को थामे रखा है। कुछ दिनों पहले मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि ओवरसप्लाई होने की वजह से देश की बड़ी आईटी कंपनियां फ्रेशर्स की सैलरी कम रखने पर समान नीति बनाने पर विचार कर रही हैं।

साइन्स, टेक्नोलॉजी, इन्जीनियरिंग तथा मैथमैटिक्स (STEM) विषयों के मामले में भारतीय हमेशा से अव्वल रहे हैं।


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यही वजह है कि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय आईटी कंपनियां तकनीक के मामले में आने वाले दिनों में दुनिया का नेतृत्व करने को तैयार हो सकते हैं।

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