डाकू भूपत सिंह था गरीबों का मसीहा, पाकिस्तान में हुआ दफन

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Updated on 26 Feb, 2016 at 4:15 pm

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दुनिया में एक से बढ़कर एक खूंखार डकैत हुए हैं। उन्हीं में एक डकैत ऐसा भी हुआ है, जिसका मकसद था, अमीरों का मोटा माल लूट कर उसे गरीबों में बांट देना।

दरअसल यह सच्ची कहानी है। यह कहानी है उस भारतीय रॉबिनहुड की, जिसे राजा-रजवाड़ों और अंग्रेजों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिए जाना जाता है। उसका नाम था डाकू भूपतसिंह।

हवा से बात करता था भूपत सिंह

गुजरात के कठियावाड में जन्मा भूपत सिंह बचपन से ही बहादुर था। तेज भागने वाले घोड़ों का उसे शौक़ था और उन घोड़ों पर जब वह सवार होता था, तो उसे हरा पाना नामुमकिन था। ऐसा लगता था कि वह हवा से बात कर रहा हो। इसके साथ ही दौड़ की कला में उसे विशेष महारत हासिल थी।

अच्छों के लिए भगवान, बुरों के लिए हैवान

भूपत की क्रूरता की कई कहानियां हैं। वहीं कई कहानियों में उसके शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम के बारे में बताया गया है।

क्यों बंदूक उठाने के लिए मजबूर हुआ भूपत सिंह?

भूपत सिंह का आरंभिक जीवन सरल था। उसे तरह-तरह के खेल पसंद थे, लेकिन शायद विधाता को यह मंजूर नही था। उसके जीवन में एक के बाद एक ऐसी दो घटनाएं हुई, जिसकी वजह से उसे मजबूरन हथियार उठाने पड़ा।

दरअसल, भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया, जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा, तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते उसे कालकोठरी की सख़्त सज़ा झेलनी पड़ी।

बस यहीं से शुरू होती है डाकू भूपत के कठिन जिन्दगी की दास्तान।

जब पहली बार आया सुर्ख़ियों में

कहते हैं कि वडोदरा का शासक गायकवाड बेहद क्रूर था। राजस्व और लगान के नाम पर वह भोली-भाली जनता से दुर्व्यवहार करता था। यह सब भूपत के लिए असहनीय था। उसने शासक के नाम एक धमकी भरा पत्र लिखाः

“महल में काम करने वाले सभी 42 नौकरों को उनकी सेवानिवृत्ति के समय पांच-पांच वीघा जमीन दी जाए। इसकी जाहिर सूचना पूरे शहर में भी दी जाए। अगर आपने ऐसा नहीं किया, तो परिवार के सभी सदस्यों की एक-एक कर हत्या कर दी जाएगी।”

इस धमकी भरे पत्र के नीचे नाम लिखा था भूपत सिंह चौहान। यह वही भूपत सिंह था, जो धीरे-धीरे ग़रीबों का मसीहा बनते जा रहा था।


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जेल की सलाखें भूपत को अधिक दिनों तक क़ैद कर नहीं रख सकती थी। जेल से फरार होते ही, उसने पहली हत्या की। महज़ तीन साथियों से बनी उसकी टोली अपराध की दुनिया में नया अध्याय लिखने को तैयार थी। धीरे-धीरे उसके साथियों की संख्या बढ़ती चली गई। एक वक़्त के बाद उसने 42 लोगों की टोली तैयार कर ली।

भूपत सिंह को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था

यहां के राजा-रजवाड़े ही नहीं, अंग्रेज भी उसकी हुंकार सुनकर कांपते थे। अंग्रेजी शासन ख़त्म होने के बाद भी उसका आतंक थमा नहीं। भारत सरकार भी भूपत को पकड़ने में असमर्थ रही थी।

गद्दारी की सजा किसी जिल्लत से कम नहीं थी

वैसे तो भूपत के खिलाफ जिसने भी आवाज उठाने की कोशिश की, उसे सज़ा-ए-मौत ही नसीब हुई, लेकिन जब उसका कोई साथी गद्दारी करता तो उसे जान से नहीं मारा जाता था, बल्कि ता-उम्र तिलसने के लिए उनकी नाक व कान काट दिए जाते थे।

भूपत की इस क्रूर सजा का शिकार हुए लोगों की संख्या 40 से अधिक थी, इसमें चार व्यक्ति तो अब भी सुरेंद्रनजर जिला में रहते हैं।

महिलाओं के लिए सगे भाई से ज़्यादा था प्रिय

भूपत सिंह का चेहरा देख कर अच्छे अच्छों का पसीना निकल आता था, लेकिन वह महिलाओं के लिए सगे भाई से अधिक प्रिय था। कहा जाता है कि वह महिलाओं को सम्मान देता था। उसके गिरोह के किसी सदस्य की इतनी जुर्रत नहीं थी कि वे महिलाओं को बुरी नजर से देख सकें।

वर्ष 1947 की आजादी के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। हर तरफ अराजकता का महौल था, उस वक़्त भूपत महिलाओं के लिए मसीहा बन कर उभरा।

भूपत की दिलेरी से शेर भी वश में थे

कहा जाता है कि एक बार जब भारी पुलिस दल ने भूपत को जंगल में चारों तरफ से घेर लिया, तब वह शेर की गुफा में छिप गया। लगभग दो दिनों तक भूपत गुफा से बाहर नहीं निकला। जबकि इस गुफा में शेर का एक पूरा परिवार था।

पुलिस इस गुफा तक पहुंच भी गई थी, लेकिन शेरों को देखकर उनकी हिम्मत गुफा में दाखिल होने की नहीं हुई। पुलिस के वापस जाने के बाद भूपत ने अपने साथियों तक अपने यह संदेशा पहुंचाया कि वह पुलिस के चंगुल से अब भी बाहर है।

पाकिस्तान में हुआ दफन

60 के दशक में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं कि भूपत कुछ समय के लिए कच्छ से पाकिस्तान चला गया। पाकिस्तान की सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उसे घुसपैठ के आरोप में जेल भेज दिया गया। उसे एक साल की सजा सुनाई गई, लेकिन सजा पूरी होने के बाद भूपत वापस भारत नहीं आया और वहीं स्थायी तौर पर रहने लगा।

पाकिस्तान में उसने मुस्लिम धर्म अपना लिया और नाम बदल कर रख लिया अमीन युसुफ। धर्म परिवर्तन के बाद उसने वहीं एक मुस्लिम लड़की से निकाह किया। उसके चार बेटे और दो बेटियां हुईं। वह पाकिस्तान से भारत आना चाहता था, लेकिन उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई। उसने पाकिस्तान की धरती पर ही 2006 में दुनिया से विदा ले ली।

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