तो इन वजहों से भारतीय सेना में नहीं है आरक्षण व्यवस्था, शुक्र है एक जगह तो बची है

Updated on 7 May, 2018 at 4:24 pm

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आरक्षण हमारे देश में हमेशा से ही सबसे ज़्यादा चर्चित विषय रहा है। राजीनितक पार्टिया अपने स्वार्थ के लिए इस व्यवस्था को खत्म करने की बजाय बढ़ावा देती रहती हैं। हर क्षेत्र में आरक्षण के कारण कई बार योग्य छात्र वंचित रह जाते हैं और अयोग्य को नौकरी मिल जाती है। हालांकि, एक ऐसा क्षेत्र है जो अब तक आरक्षण से अछूता है और वो है भारतीय सेना।

 

 

देश की सीमाओं की रक्षा करने वाली भारतीय सेना ही एकमात्र ऐसी संस्था है जिसने आरक्षण को जगह नहीं दी है और शायद इसलिए अब तक सबसे विश्वसनीय संस्था बनी हुई है। चलिए आपको समझाते हैं कि आखिर भारतीय सेना ने खुद को आरक्षण से दूर क्यों रखा है?

1. यह धर्मनिरपेक्ष और गैर-राजनीतिक संस्था है

भारतीय सेना विश्व की सबसे प्रोफेशनल सेना मानी जाती है जो राजनीति से खुद को दूर रखने में सफल रही है। साथ ही यहां धर्म और जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं होता। सबको एक समान समझा जाता है।

हालांकि, ऐसा नहीं है कि सेना में आरक्षण लाने का प्रयास नहीं किया गया। कमांडर इन चीफ के.एम. करियप्पा के समय सेना में आरक्षण का प्रस्ताव आया था लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ये कहकर खारिज कर दिया कि इससे सेना की क्षमता पर प्रभाव पड़ेगा। उसके बाद से ही भारतीय सेना अनपे उच्च मानकों को बनाए रखने में सक्षम रही है और किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकी।

सेना को पता है कि आरक्षण के जरिए सेना को भी राजनीति से जोड़ दिया जाएगा, जो देशहित में नहीं होगा।

 

2. मेरिट के आधार पर चुनाव


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सेना में कैडेट का चुनाव किसी की सिफारिश और पहचान से नहीं, बल्कि मेरिट के आधार पर होता है चाहे वो सैनिक हो या अधिकारी। अधिकारियों की चुनाव प्रक्रिया और कठिन है। उन्हें लिखित परिक्षा पास करने के बाद सर्विस सेलेक्शन बोर्ड (SSB) में 5 दिन लंबे साक्षात्कार प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उसके बाद मेडिकल टेस्ट पास करने के बाद ही मेरिट में उनका नाम आता है। इतना ही नहीं सिलेक्शन होने के बाद उन्हें एक साल की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है, फिर कमीशन मिलता है।

ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि सेना में वही बना रह सकता है जो शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत हो। सेना के नियम कायदों के अनुरूप चलना हर किसी के वश की बात नहीं होती। तभी तो अधिकारियों की कमी होने के बावजूद सेना अपनी भर्ती प्रक्रिया को बिल्कुल आसान नहीं बनाती। वह सिर्फ बेहतरीन कैंडिटेट का ही चुनाव करती है, क्योंकि सेना में भर्ती हुए लोग देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होते हैं और सेना देश की सुरक्षा से किसी कीमत पर समझौता नहीं कर सकती। ऐसे में ज़रा सोचिए यहां अगर आरक्षण लागू हो जाता तो काबीलियत की बजाय जाति के आधार पर भर्ती होती और फिर जो होता हो राम भरोसे ही था।

 

3. यह भारतीय सेना के आचार के खिलाफ है

भारतीय सेना ‘अनेकता में एकता’ के विचार पर न सिर्फ विश्वास करती है, बल्कि उसे अमल में भी लाती है। सेना में देश के कोने-कोने से, अलग-अलग भाषा बोलने वाले अलग-अलग धर्म के लोग आते हैं, फिर भी वो पूरे सद्भाव व शांति से साथ रहते हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाता है, क्योंकि यहां सब लोग अपनी मातृभूमि से प्यार करते हैं। जब वो सेना में आते हैं तो खुद को पहले भारतीय समझते हैं। वे एक परिवार की तरह रहते हैं और अपने सहयोगियों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

इसके विपरित यदि आरक्षण व्यवस्था लोगों को धर्म और जाति के आधार पर बांटती है और जब लोग समूह में बंट जाएंगे तो एक होकर काम नहीं कर पाएंगे और सेना का ढांचा कमजोर पड़ जाएगा, इसलिए भारतीय सेना हमेशा से आरक्षण के खिलाफ रही है।

 

 

भारत के लोगों का सेना पर अटूट विश्वास और उसके प्रति सम्मान है। इसलिए किसी को भी भारतीय सेना की संरचना में बदलाव की कोशिश नहीं करनी चाहिए और देशहित में काम करने वाली सेना का हमेशा सम्मान करना चाहिए।

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