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संस्कृत की विरासत से पुनः विश्वगुरू बनेगा भारत

Published on 9 February, 2016 at 4:37 pm By

संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है। संसार की समृद्धतम भाषा ‘संस्कृत’ के रूप में सबसे उन्नत मानवीय समाज और विज्ञान की स्थापना की गई। इस देवभाषा के अध्ययन, मनन मात्र से ही मनुष्य में सूक्ष्म विचारशीलता और मौलिक चिंतन जन्म लेता है।

सनातन संस्कृति के सभी प्रमुख साहित्यिक और वैज्ञानिक शास्त्र संस्कृत भाषा में ही हैं। भारतीय शिक्षण-शैली को समाप्त करने के बाद मैकाले द्वारा भारतीयों से ‘भारतीयता’ को नष्ट करने का जो षड्यंत्र रचा गया। दुर्भाग्य से हम उसमे बुरी तरह फंस गए, जिसके फलस्वरूप तथाकथित आधुनिक या आंग्लभाषी शिक्षा-पद्धति से शिक्षित लोग अज्ञानतावश संस्कृत को सिर्फ पूजा-पाठ और कर्मकाण्डों से जुड़ा मानकर अवैज्ञानिक तथा अनुपयोगी मानने लगे।

वास्तविकता यह है कि यह भाषा महज साहित्य, दर्शन और अध्यात्म तक ही सीमित नहीं है, अपितु गणित, विज्ञान, औषधि, चिकित्सा, इतिहास, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे अनगिनत क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

यूरोप में संस्कृत की बढ़ती लोकप्रियता


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ब्रिटिश शिक्षाविद डॉ. विल डुरंट मानते हैं कि “संस्कृत आधुनिक भाषाओं की जननी है। संस्कृत बच्चों के सर्वांगीण बोध ज्ञान को विकसित करने में मदद करती है।” आलम ये है कि लंदन के कई बड़े कान्वेंट स्कूलों में बच्चों को द्वितीयक भाषा के रूप में संस्कृत सीखना अनिवार्य है। भारत से विशेष तौर पर वहां संस्कृत के शिक्षकों की व्यवस्था की जाती है।

सिर्फ ब्रिटेन में ही नहीं, बल्कि अन्य यूरोपीय देशों में भी संस्कृत लिखी-पढी और बोली जाती है। साल 2007 में राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. अब्दुल कलाम यूनान गए थे।

वहां के आधिकारिक स्वागत कार्यक्रम में ग्रीस के प्रेजीडेंट कार्लोस पाम्पाडलीस ने डॉ कलाम के लिए “राष्ट्रपति महाभाग सुस्वागतं यवनदेशे”, इस संस्कृत वाक्य से अपने भाषण का प्रारंभ किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में संस्कृत, प्राचीन भारत और ग्रीक भाषा के प्राच्य संबंधों पर व्यापक प्रकाश डाला।

उच्च तकनीकी में काफी सहयोगी है संस्कृत

ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स और कंप्यूटर क्षेत्र में भी संस्कृत के प्रयोग की सम्भावनाओं पर फ्रांस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और इंग्लैंड जैसे देशों में शोध जारी है। वानस्पतिक सौंदर्य प्रसाधन (हर्बल कॉस्मैटिक्स) एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के तेजी से बढ़ते प्रचलन से संस्कृत की उपयोगिता और बढ़ गई है, क्योंकि आयुर्वेद पद्धतियों का ज्ञान सिर्फ संस्कृत में ही लिपिबद्ध है।

नासा की एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका 6ठी और 7वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है, जिससे सुपर कंप्यूटर का उपयोग अधिकतम सीमा तक किया जा सके।

इस परियोजना की समय सीमा 2025 (6ठी पीढ़ी के लिए) और 2034 (7वीं पीढ़ी के लिए) है। इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।

सर्वाधिक परिमार्जित व्याकरण सम्मत भाषा

अपनी सुस्पष्ट और छन्दात्मक उच्चारण प्रणाली के चलते संस्कृत भाषा को ‘स्पीच थेरेपी टूल’ (भाषण चिकित्सा उपकरण) के रूप में मान्यता मिल रही है। भाषा वैज्ञानिकों के मुताबिक़ संस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। अतएव किसी बालक के लिए उंगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि व संस्कृत बोली से अच्छा कोई विकल्प नहीं है।

वर्तमान यूरोपीय भाषाएं बोलते समय जीभ और मुंह के कई हिस्सों का और लिखते समय उंगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। वैज्ञानिक कई दिनों तक ऐसी भाषा/लिपि के विकास में थे, जिसका संगणकीय प्रणाली में उपयोग कर,उसका संसार की किसी भी आठ भाषाओं मे उसी क्षण रूपान्तर हो जाए। अंततोगत्वा ‘संस्कृत’ ही एकमात्र ऐसी भाषा नजर आई।

फोर्ब्स पत्रिका 1985 के अंक के अनुसार दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।

संस्कृत भाषा वर्तमान में “उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी” तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज “सरल किर्लियन फोटोग्राफी” भी नहीं है।

रक्षा वैज्ञानिक भी काम कर रहें हैं संस्कृत पर



अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, और जापान जैसे बेहद तकनीकी पूर्ण देश वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। गौरतलब है कि नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है।

इसी तरह ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है। इन सभी शोधों के लिए वैदिक संस्कृत पर काफी तेजी से पश्चिम काम कर रहा है।

परन्तु हम भारतीय कुछ भी सीखने से पहले जबरन ENGLISH डकारने में लगे हैं, जबकि पूरी दुनिया संस्कृत की ओर दौड़ रही है।

विश्व प्रसिद्द भारतीय वैज्ञानिकों को मिली प्रेरणा

भारतीय वैज्ञानिकों को नव अनुसंधान की प्रेरणा संस्कृत से ही मिली। जगदीशचन्द्र बसु, चंद्रशेखर वेंकट रमण ,आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों को संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वैज्ञानिक खोजों के लिए वे संस्कृत को ही आधार मानते थे। इनके अनुसार संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है।

प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान एवं सार संस्कृत भाषा में निहित है। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय विज्ञान के लिए संस्कृत शिक्षा को आवश्यक मानते थे।

जगदीशचन्द्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे। डॉ. साहा अपने घर के बच्चों की शिक्षा संस्कृत में ही कराते थे और एक वैज्ञानिक होने के बावजूद काफी समय तक वे स्वयं बच्चों को संस्कृत पढ़ाते थे।

विज्ञान को अध्यात्म से जोड़ने की कड़ी है संस्कृत

आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से विज्ञन आज भी अनभिज्ञ है। उड़न तश्तरियां कहां से आती हैं और कहां गायब हो जाती हैं। इस प्रकार की कई बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्य बनी हुई हैं।

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है। विमान विज्ञान, नौका विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार के और भी अनगिनत सूत्र हमारे ग्रंथों में समाए हुए हैं, जिनसे आधुनिक विज्ञान को अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश मिल सकते हैं।

आज अगर विज्ञान के साथ संस्कृत का समन्वय कर दिया जाए, तो अनुसंधान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्राचीन महान ग्रंथों के अलावा बौद्ध, जैन आदि धर्मों के अनेक मूल धार्मिक ग्रंथ भी संस्कृत में ही हैं। संस्कारी जीवन की नींव संस्कृत वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होने के बावजूद भी मानव-समाज अवसाद, तनाव, चिंता और अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है, क्योंकि केवल भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है, इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यंत जरूरी है।

जिस समय संस्कृत का बोलबाला था उस समय मानव-जीवन ज्यादा संस्कारित था। यदि समाज को फिर से वैसा संस्कारित करना हो तो हमें फिर से सनातन धर्म के प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा।

संस्कृत की धरोहर को सहेजने की दरकार

वर्तमान में ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे 200 से भी ज्यादा लब्ध-प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है। नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियां हैं, जिनका वे अध्ययन कर रहे हैं। माना जाता है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं।


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दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में नहीं है। जो हैं भी वहां संस्कृत केवल साहित्य और कर्मकांड तक सीमित हैं, विज्ञान के रूप में नहीं।

भारत को विश्वगुरू और विश्व में सिरमौर बनाने के लिए संस्कृत के पुनरूत्थान की आवश्यकता है, क्योंकि संस्कृत हमारी विरासत है और उस पर हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है।

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