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भारत में बन रही है ‘दुनिया की सबसे बड़ी नदी’, खर्च होंगे 168 बिलियन डॉलर

Published on 7 December, 2016 at 9:31 pm By

भारत सरकार अपने महात्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना पर तेजी से काम कर रही है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद भारत में करीब 7800 मील लंबे जलमार्ग का विकास किया जा सकेगा, जो दुनिया की सबसे लंबी नदी नील से दोगुनी होगी। इस परियोजना के अंतर्गत 30 नदियों को एक-दूसरे से जोड़ने पर काम चल रहा है। इन नदियों में 14 की उद्गमस्थली हिमालय है, शेष मैदानी इलाके से ताल्लुक रखती हैं।


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परियोजना के अंतर्गत 30 बड़े नहर और करीब 3 हजार से अधिक बड़े जलाशयों का निर्माण किया जाना है। विशेषज्ञों का आकलन है कि इससे न केवल बाढ़ की समस्या से मुक्ति मिलेगी, बल्कि सूखे का भी निदान संभव हो सकेगा। इससे करीब 86 हजार एकर नई कृषि योग्य भूमि तैयार की जा सकेगी, वहीं 34 हजार मेगावाट से अधिक बिजली की पैदावार हो सकेगी।

इस परियोजना की परिकल्पना बेहद पुरानी है। ब्रिटिश राज के दौरान सबसे पहले वर्ष 1858 में ब्रिटिश मिलीटर इन्जीनियर ऑर्थर थॉमस कॉटन ने ईस्ट इन्डिया कंपनी की बंदरगाहों तक पहुंच को आसान बनाने के लिए तथा सूखे की समस्या के निदान के लिए नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, माना जाता है कि तत्कालीन भू-राजनैतिक परिस्थितियों की वजह से इस प्रस्ताव पर अमल नहीं किया जा सका।

इसके बाद वर्ष 1972 में भारतीय राजनेता के. लक्ष्मण राव ने 16 सौ मील लंबे एक नहर का प्रस्ताव दिया था, जिसके माध्यम से बाढ़ के पानी को उपयोग लाया जा सके। इसके दो साल बाद ही दिनशॉ जे. दस्तूर नामक जल प्रबंधन विशेषज्ञ ने सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कई नहरों के निर्माण का प्रस्ताव दिया था।

वर्ष 1980 में भारत सरकार की जल संपदा मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय जल विकास एजेन्सी का निर्माण किया गया, जिसका काम इस परियोजना का अध्ययन करना था। काफी समय से लंबित यह परियोजना केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान कहा था कि नदियों को जोड़ने की परियोजना उनका सपना है, क्योंकि इससे देश के मेहनतकश किसानों को फायदा होगा।



पिछले दिनों मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि नदी जोड़ो परियोजना की शुरुआत होने ही वाली है। इनमें पहली परियोजना मध्य प्रदेश में केन और बेतवा को आपस में जोडऩे की है, जिस पर इसी साल काम शुरू होने की संभावना है। इसके अलावा पश्चिम भारत में दमन गंगा तथा पिन्जल व पश्चिम व मध्य भारत में पार तथा ताप्ती नदियों को जोड़ने संबंधी प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार कर ली गई है। वहीं, दूसरी तरफ हिमालयी नदियों मानस, तीस्ता तथा गंगा को जोड़ने की योजनाओं पर काम तेजी से चल रहा है।

नदी जोड़ो परियोजना को जहां हाथों-हाथ लिया जा रहा है, वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इस परियोजना को पर्यावरण तथा जैव-पारिस्थितिकी के लिए खतरा मानते हैं। परियोजना की आलोचना करने वाले कहते हैं कि 168 अरब डॉलर की यह परियोजना बेहद खर्चीली है। इसके निर्माण में कई दशक का समय लगेगा और समय के साथ इसकी लागत बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। वहीं, दावा किया जा रहा है कि करीब 15 लाख से अधिक लोग इसकी वजह से विस्थापित हो जाएंगे।


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परियोजना को मुफीद नहीं मानने वाले एनजीओ और पर्यावरणविद पूछते हैं कि नदियों की प्राकृतिक धारा को हम रोकने या मोड़ने वाले कौन होते हैं। यह उतना ही हास्यास्पद है, जितना कि यह बताना कि इस परियोजना से हमें फायदा होने जा रहा है या नुकसान। विरोध करने वाले पर्यावरणविदों का कहना है कि एक नदी की अपनी क्षमता होती है और उसे प्राकृतिक रूप में ही रहने दिया जाना चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि केन-बेतवा परियोजना से करीब 2723 हेक्टेयर भूमि पानी में डूब जाएगी और करीब 12 गांव के 2939 लोग इससे प्रभावित होंगे। वहीं इससे वन विभाग की 968 एकड भूमि के प्रभावित होने की भी बात कही जा रही है।


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परियोजना के पूरा होने से 98847 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। इससे शिवपुरी, रायसेन, विदिशा, सागर तथा अशोकनगर जिलों को फायदा होगा। परियोजना से 650 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी और पहले चरण में 78 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी किया जाएगा।

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