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कभी सड़कों पर चूड़ी बेच कर बीता बचपन, आज हैं IAS अफ़सर

Published on 11 April, 2016 at 11:28 am By

रंग-बिरंगी चूड़ियों की तरह उसका बचपन उतना रंग भरा नहीं था। हर सुबह जब वह लड़का अपनी मां के साथ चूड़ी बेचने निकलता था, तब दो वक़्त की रोटी के लिए उसके जीवन के संघर्ष की कहानी नये सिरे से शुरू होती थी। मां सड़कों पर जब-जब आवाज़ लगाती, ‘चूड़ी ले लो.. चूड़ी’, तो पीछे से वह लड़का तोतली आवाज़ में दोहराता।

परिस्थितियों ने जहां उसे जीवन के लिए लड़ना सिखाया, वहीं ग़रीबी, शराबी पिता और भूख ने एक सपने को जन्म दिया। कठिन परिश्रम और सच्ची लगन ने उस सपने को हक़ीकत का नाम दिया, जो आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। उसका नाम है ‘आईएएस रमेश घोलप’।

जिन्दगी के हर मोड़ ने ली परीक्षा, पर आईएएस रमेश घोलप कभी मंज़िल से भटके नहीं।


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रमेश अभी झारखंड मंत्रालय के ऊर्जा विभाग मे संयुक्त सचिव हैं और उनकी संघर्ष की कहानी प्रेरणा बनकर लाखों लोगों के जीवन में ऊर्जा भर रही है। रमेश के पिता नशे की लत की वजह से अपने परिवार पर ध्यान नहीं देते थे। जीविका के लिए रमेश और उनकी मां को सड़कों पर जा कर चूड़ी बेचने के लिए विवश होना पड़ता था। इससे जो पैसे जमा होते थे, उसे पिता अपनी शराब पर खर्च कर देते थे।

रमेश के पास न रहने के लिए घर था और न पढ़ने के लिए पैसे। था तो सिर्फ़ हौसला, जो उनके सपनों को पूरा करने के लिए काफ़ी था। रमेश का बचपन उनकी मौसी को मिले सरकारी योजना के तहत इंदिरा आवास में बीता। वह वहां आजीविका की तलाश के साथ पढ़ाई करते रहे, लेकिन जिन्दगी को रमेश को अभी और परखना बाकी था।

मैट्रिक परीक्षा में कुछ दिन ही बाकी होंगे की रमेश के पिता की मृत्यु हो गई। इस घटना ने उनको झकझोर दिया, लेकिन जिन्दगी के हर उठा-पटक का सामना कर चुके रमेश हौसला नहीं हारे। विपरीत हालात में भी उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा दी और 88.50 फीसदी अंक हासिल किए।

रमेश बताते हैं कि उन्होंने वह दिन भी देखे हैं, जब घर में एक अन्न नहीं होता था। फिर पढ़ाई में खर्च उनके लिए बहुत बड़ी मुसीबत थी। रमेश आगे कहते हैं कि एक बार मां को सामूहिक ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर 18 हजार ऋण मिले, जिसको उन्होंने पढ़ाई करने के लिए इस्तेमाल किया और गांव छोड़ कर इस इरादे से बाहर निकले कि वह कुछ बन कर ही घर लौटेंगे।

शुरुआत में उन्होने तहसीलदार की पढ़ाई करने का फ़ैसला किया और तहसीलदार की परीक्षा पास कर तहसीलदार बने, लेकिन कुछ वक़्त बाद उन्होने आईएएस बनने को अपना लक्ष्य बनाया।

कोशिश करने वालों की कभी हार नही होती।



महाराष्ट्र के सोलापुर जिला के वारसी तहसील स्थित उनके गांव ‘महागांव’ में रमेश की संघर्ष की कहानी बच्चा-बच्चा जानता है। तंगहाली के दिनों में रमेश दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं, दुकानों का प्रचार, शादी की पेंटिंग करते थे। इन सब से जो कुछ भी आमदनी होती थी, वह पढ़ाई पर खर्च करते थे।

कलेक्टर बनने का सपना आंखों में संजोए रमेश पुणे पहुंचे। हालांकि, पहले प्रयास में रमेश विफल रहे। लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2011 में एक बार फिर से यूपीएससी की परीक्षा दी। इसमें रमेश को 287वां स्थान प्राप्त हुआ। इस तरह उनका आईएएस बनने का सपना साकार हुआ।

जब अफ़सर बन पहुचे अपने गांव तो हुआ जोरदार स्वागत।

रमेश अपने गांव में बिताए कुछ आख़िरी यादों के साथ बताते हैं कि उन्होने अपनी मां को 2010 के पंचायती चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। उनको लगता था गांव वालों का सहयोग मिलेगा, लेकिन मांं को हार का सामना करना पड़ा। रमेश कहते हैं कि उसी दिन से उन्होंने यह प्रण किया था कि इस गांव में वह तभी अपने कदम रखेंगे जब, वह अफसर बन कर लौटेंगे।


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आईएएस बनाने के बाद जब 4 मई 2012 को अफसर बनकर पहली बार गांव पहुंचे, तब उनका जोरदार स्वागत हुआ। आख़िर होता भी क्यों नही? वह अब मिसाल बन चुके थे। उन्होंने अपने हौसले के बलबूते यह साबित कर दिया था, अगर करना चाहों तो इस दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है।


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इस कहानी से प्रेरणा लीजिए। सपने देखिए और चल पड़िए उसे पूरा करने।

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