भागदौड़ की इस जिन्दगी में अपने बच्चों के बचपन को ऐसे बचाएं।

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Updated on 25 Dec, 2015 at 10:52 am

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समाज के आधुनिकीकरण कि प्रक्रिया में एक जबरदस्त विरोधाभास देखने में आता है कि सबके सामने सभ्य-सुसंकृत दिखने वाले लोग असल जिन्दगी में उतने सभ्य और संस्कारी नहीं होते। इन चीजों का असर बड़ों पर तो नहीं, पर बच्चो पर बहुत ज्यादा पड़ता है। एकल परिवारों में बच्चे अपने मां-बाप के साथ रहते हैं। सीधी सी बात है, बच्चे पर सबसे ज्यादा प्रभाव, उसके अपने अभिवावकों का ही पड़ता है।

इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में लोग इतने मशगूल हो जाते हैं कि अपने बच्चे पर ध्यान ही नहीं दे पाते। यदि देते भी हैं, तो उसके साथ प्रॉपर बिहेवियर नहीं दिखा पाते। घर में होने वाले झगड़ों-कलह या और भी ऐसे कई कारक हैं, जिसमें ध्यान न दे पाने के कारण बच्चे के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उसका बचपन छोटी उम्र में ही दम तोड़ने लगता है। फिर, वह वर्जनाएं तोड़ने कि कोशिश करने लगता है। ऐसे में क्या करें उसके बचपन को बचाने के लिए?

1. सामने झगड़ा न करें

अक्सर पैरेंट्स बच्चों के सामने बुरी तरह झगड़ते हैं। कई बार तो बच्चे से दोनों में से चुनाव करने को भी कहा जाता है। अपने अहम् की तुष्टि करते वक्त वे भूल जाते हैं कि उनके मासूम बच्चे के ऊपर क्या बीत रही होगी। आगे चल कर बच्चे के दिमाग में गलत भावनाएं पनपती हैं। यहां तक की वह हिंसक भी हो सकता है। इसलिए कम से कम बच्चों के सामने झगड़ा बिलकुल न करें।

2. अकेला न छोड़ें

पिछले दो दशकों में समाज में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। एकल परिवारों की तेजी से बढ़ती संख्या भी इसी परिवर्तन की उपज है। ज्यादातर कामकाजी पैरेंट्स के बच्चे अक्सर घर में अकेले होते हैं, जबकि यह समय बच्चो में संस्कारों के बीज बोने का होता है। ज्यादातर टीनएजर्स इसी अकेलेपन के कारण गुमराह हो जाते हैं। बच्चे को अकेला छोड़ने से परहेज करें, यदि संभव नहीं है, तो भी उसे पर्याप्त समय देने की कोशिश करें।

3. भरोसा बनाए रखें

कंपटीशन के इस युग में ज्यादातर मां-बाप अपने बच्चे के ऊपर पढ़ाई का जबरदस्त दबाव बनाते हैं। लेकिन परिणाम अपेक्षानुकूल न आने पर उसे जम कर कोसते हैं। यथा “फलां इतने मार्क्स लेके आया है और तुम इतने में ही लटक गए”। ध्यान रखें, हर बच्चा आइन्स्टीन नहीं बन सकता। हर बच्चे की अपनी खूबियां होती हैं उसे निखारने और अच्छा करने के लिए प्रेरित करिए। उसे हतोत्साहित न करें, क्योंकि इससे बच्चे में फ्रस्ट्रेशन और कुंठा की भावना जन्म ले सकती है।

4. रिश्तेदारों से संपर्क बनाये रखें


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बच्चों को उसके बांकी रिश्तेदारों जैसे नाना-नानी, दादा-दादी, चाचा, बुआ उनके बच्चे आदि के संपर्क में भी बनाए रखना चाहिए। ये रिश्ते बच्चे को अपने-आप बहुत कुछ सिखा देते हैं। इन इंटरेक्शन से बच्चे को सामजिक शिष्टाचार सीखने का मौक़ा मिलता है।

5. गतिविधियों पर नजर बनाइये

कहा जाता है बच्चे कच्ची मिट्टी के घड़े होते हैं। जिस माहौल में रहेंगे वैसा ही बन जाएंगे। इंटरनेट तक सिर्फ बड़ों की ही नहीं, बच्चों की भी खासी पहुंच है। टीनएजर बच्चों के इंटरनेट द्वारा बहकने के बहुत से मामले सामने आए हैं। बच्चे की इंटरनेट ब्राउजिंग पर निगाहें बनाए रखें।

6. नियमित बातें जरूर करें

मेट्रो सिटीज में अक्सर देखा जाता है की बच्चे मां-बाप से काफी कटे-कटे रहते हैं और अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहते हैं। सीधे संवाद के न होने से बच्चों और आप में काफी गैप देखने को मिल सकता है। हालांकि, इसके दूरगामी परिणाम काफी घातक होते हैं। कहीं ऐसा न हो की बच्चा बाद में आपकी भावनाओं को समझ ही न सके। इसलिए नियमित रूप से बातें अवश्य करें।

7. पैरेंट्स मीटिंग अवॉयड न करें

आपको ये जानने का पूरा अधिकार है की बच्चे का व्यवहार स्कूल में कैसा है। सिर्फ एग्जाम्स की रिपोर्ट कार्ड देखने से काम नहीं चलता। बच्चा दिन का सबसे बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताता है। ऐसे में उसके क्लास टीचर्स और सहपाठी वगैरह आपको उसे व्यवहार संबंधी जानकारियां ज्यादा अच्छी तरह से दे सकते हैं।

8. डाइवोर्स्ड हैं फिर भी संवाद न छोड़ें

तलाकशुदा दंपतियों से ज्यादा कष्ट उनके बच्चे झेलते हैं। यदि बच्चे छोटे हैं या फिर टीनएजर्स है तो प्रॉपर कम्यूनिकेशन बनाए रखें। अन्यथा, बच्चा अपने मनोबल को खो सकता है। कई बार बच्चे नशे की लत भी पाल लेते हैं।

9. घरेलू हिंसा से परहेज करें

घरों में होने वाली घरेलू-हिंसा, मार -पीट, गाली-गलौज इत्यादि से बच्चा सहम भी सकता है। या फिर उसमें विद्रोह की भावना भी उत्पन्न हो सकती है। उसका रियेक्शन आम बच्चों से अलग-थलग दिखाई पड़ सकता है। इसलिए बच्चों के लिए ही सही किसी भी तरह की हिंसा को घर में टोटली अवॉयड करें। यदि टेलीविजन में हिंसा होती है, तो उससे दूरी बनाए रखने की कोशिश करिए।

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