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हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के खेल का मुरीद था तानाशाह हिटलर भी

Updated on 4 November, 2016 at 12:38 pm By

किसी भी खिलाड़ी की महानता को मापने का सबसे बड़ा पैमाना है कि उसके साथ कितनी किवदंतियां जुड़ी हुई हैं। मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जो हॉकी, विशेषकर भारतीय हॉकी को विश्वव्यापी तौर पर एक अलग ही स्तर पर ले गए।

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले, क्रिकेट में ब्रैडमैन और बॉक्सिंग में मोहम्मद अली के बराबर का दर्जा दिया गया है।

भारतीय सेना का यह मेजर जब हॉकी के मैदान में उतरा, तो हर कोई इसकी शख्सियत का कायल बन गया। खुद जिसके नाम से दुनियाभर की रियासतें कांप उठती थीं, वह हिटलर भी ध्यानचंद के खेल का मुरीद था।


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1936 के ओलंपिक की बात है। उस वक़्त ओलंपिक जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के शहर बर्लिन में आयोजित हुए थे। भारतीय टीम का  तानाशाह की टीम जर्मनी से फाइनल मैच 15 अगस्त को था। बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40,000 लोग फ़ाइनल देखने आए थे। जर्मनी की टीम को उसके घर में हराना आसान नहीं था।

एक वक़्त ऐसा था, जब हाफ़ टाइम तक भारत मात्र एक गोल से आगे था। भारतीय टीम ने जो प्रदर्शन किया, उसमें ध्यानचंद का रोल महत्वपूर्ण रहा। ध्यानचंद ने अपने जूते और मोज़े उतारे और नंगे पांव खेलने लगे। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

ध्यानचंद के तीन महत्वपूर्ण गोल के साथ भारत जर्मनी को इस फाइनल मुकाबले में 8-1 से करारी शिकस्त देने में कामयाब रहा।

भारतीय टीम के बेहतरीन खेल के प्रदर्शन को लेकर एक अख़बार मॉर्निंग पोस्ट ने लिखाः



“बर्लिन लंबे समय तक भारतीय टीम को याद रखेगा। भारतीय टीम ने इस तरह की हॉकी खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों। उनके स्टिक वर्क ने जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया।”

hockey

मेजर ध्यानचंद्र अपनी टीम के साथ bbci

ध्यानचंद के खेल से प्रभावित हो अगले दिन हिटलर ने ध्यानचंद को मिलने के लिए बुलाया। ध्यानचंद ने हिटलर के कई किस्से सुने थे, वह डरे हुए थे कि आखिर क्रूर तानाशाह के नाम से पहचाने जाने वाले हिटलर ने उन्हें बुलाया क्यों है, लेकिन वह आमंत्रण पत्र स्वीकार करते हुए उनसे मिलने पहुंचे।

ध्यानचंद का हॉकी में रुतबा ही कुछ ऐसा था कि खुद हिटलर ने उन्हें जर्मनी की ओर से खेलने की पेशकश कर दी थी। यहां तक कि इस बात का पता लगने पर कि वह भारतीय सेना में मेजर भी हैं, हिटलर ने ध्यानचंद के समक्ष जर्मनी की सेना से जुड़ने का प्रस्ताव तक रख दिया था।

इस खास वीडियो में देखें भारतीय हॉकी टीम को जर्मनी के खिलाफ खेलते हुए, हिटलर खुद इस मैच के दौरान था मौजूद।

उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्मे ध्यानचंद महज 16 साल की उम्र में पंजाब रेजिमेंट में एक सिपाही के रूप में भर्ती हुए थे। रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी ने उन्हें हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। ध्यानचंद के पिता समेश्वर दत्त सिंह भी सेना में हॉकी खेलते थे।

एक बार कुछ ऐसा हुआ कि हॉलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर देखी गई, इस शक के साथ कहीं स्टिक में कोई चुम्बक तो नहीं लगी।

ध्यानचंद ने वर्ष 1928 में, 1932 में और 1936 में ओलिंपिक खेलों में भारत को हॉकी का स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मेजर ध्यानचंद को 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।


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कई दशकों से भारत के अमूल्य हीरे को भारत रत्न देने की मांग उठती रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश, भारत रत्न पर हो रही राजनीति ने हॉकी के इस सरताज को इससे अभी तक दूर रखा है।

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