जीन्स तो पहनते होंगे लेकिन क्या आपको इसके बारे में पता है !

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Updated on 10 Dec, 2016 at 4:59 pm

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जीन्स का शुमार लोकप्रिय पहनावों में होता है। बहुत कम लोगों को पता है कि जब जीन्स की शुरुआत हुई तो इसे खदानों में काम करने वाले मजदूर पहना करते थे। दरअसल, यह कपड़ा बेहद मोटा होता था और उनके काम के लिहाज से बेहतर था।

20वीं सदी के अंत तक आते-आते यह स्टाइल सिम्बॉल बन गया।

जीन्स का आविष्कार किसने किया था, इसका कोई खास उल्लेख नहीं मिलता है। हालांकि, दस्तावेज बताते हैं कि 16वीं सदी के उत्तरार्ध में यह मोटा कपड़ा चलन में आया था।

दस्तावेजों के मुताबिक, जीन्स के कपड़े का निर्माण 1600 की शुरुआत में इटली के एक कस्बे तुरीन के निकट चीयरी में किया गया था। इसे जेनोवा के हार्बर के माध्यम से बेचा गया। जेनोवा एक स्वतंत्र गणराज्य की राजधानी थी, जिसकी नौसेना बेहद शक्तिशाली थी। कई लोग मानते हैं कि जीन्स का नाम जेनोवा के नाम पर पडा़ है। जीन्स बनाने के लिए कच्चा माल फ्रांस के निम्स शहर से आता था, जिसे फ्रेन्च में दे निम कहते थे, इसीलिए इसके कपडे़ का नाम डेनिम पड़ गया।


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और 18वीं सदी के आते-आते जीन्स दुनिया के कई देशों तक पहुंच गया। उन दिनों फ्रान्स और भारत में इस तरह के कपड़े को स्वतंत्र रूप से बनाया जाता था। भारत में इस कपड़े को डुंगारी कहते थे। इसे आमतौर पर मुंबई में रहने वाले नाविक पहना करते थे। साल 1850 तक जीन्स एक लोकप्रिय परिधान में गिना जाने लगा। और यही वह समय था, जब जर्मन व्यापारी लेवी स्ट्रॉस ने जीन्स को अपनी ब्रान्डिंग से बेचना शुरू किया।

स्ट्रॉस ने अमेरिका में इस नए परिधान का पेटेन्ट करा लिया और उनका यह बिजनेस चल निकला।

उन दिनों जीन्स को ओवरॉल्स कहा जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका की फैक्टिरियों में काम करने वाले मजदूर इसे पहना करते थे। बाद में अमेरिकी सैनिकों ने स्टाइल के लिए इसे पहनना शुरू किया और यह बेहद लोकप्रिय हो गया।

साल 1960 के बाद में इसका नाम जीन्स रखा गया। जो कहने में भी काफी ‘कूल’ है।

एक जीन्स को अपनी पूरी जिन्दगी में करीब 34,00 लीटर पानी की जरूरत होती है। यह अलग बात है कि हाल ही में कवायद की गई है कि जीन्स को धोना नहीं चाहिए। इससे इसकी उम्र पर असर पड़ता है।

आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया मे जितने जीन्स का निर्माण होता है, उनमें से आधे से अधिक का निर्माण एशिया में होता है।

आमतौर पर लोग ‘रफ जीन्स’ पसंद करते हैं, जो दिखने में बेहतरीन होती है। इस तरह की जीन्स बनाने में सैंडपेपर का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि जीन्स बनाने वाले कारीगर सिलिकोसिस नाम की बिमारी के शिकार हो जाते हैं।

साल 1970 में इसे फैशन के तौर पर स्वीकार कर लिया गया। तब से लेकर अब तक जीन्स का क्रेज समाज के हर तबके के लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। अमीर, गरीब, बच्चा, बूढ़ा या फिर जवान, कोई भी हो, जीन्स के प्रति दीवानगी बढ़ती ही जा रही है।

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