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नाजियों के डर से जूते के डिब्बे में भेजी गई फीफा वर्ल्ड कप की ट्रॉफी, जानें इससे जुड़ी रोचक बातें

Published on 13 July, 2018 at 9:00 am By

सोने से बने फीफा वर्ल्ड कप के खिताब को अपने हाथों में लेकर चूमना, किसी भी फुटबॉल खिलाड़ी का सुनहरा सपना पूरा होने से कम नहीं है। एक ऐसा सपना जिसे बनने-बुनने में 4 साल लग जाते हैं। खैर जल्दी ही फुटबॉल के दीवानों का यह इंतजार खत्म होने वाला है। सिर्फ एक मुकाबले के बाद ही फीफा वर्ल्ड कप-2018 के चैंपियन टीम का पता चल जाएगा। 15 जुलाई को जब लुजनिकी स्टेडियम में खिताबी मुकाबले के लिए फ्रांस और क्रोएशिया टीम भिड़ेंगी तो इस सुनहरी ट्रॉफ़ी का हक़दार भी मिल जाएगा।


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हालांकि, फिलहाल यह कहना काफी मुश्किल होगा कि फीफा की यह आकर्षक खिताब किस टीम के हाथ लगेगी, लेकिन उससे पहले इस  खिताब से जुड़ा इतिहास और उनसे जुड़े रोचक तथ्यों को जानना बेहद दिलचस्प होगा।

 

फीफा वर्ल्ड कप की ट्रॉफी का असल नाम विक्ट्री था

 

 

फीफा विश्व कप की शुरुआत 1930 में उरुग्वे में हुई थी। तब फीफा की इस ट्रॉफी का असल में नाम विक्ट्री था जो कि ग्रीक की देवी ‘विक्ट्री’ के नाम पर रखा गया था। ये ट्रॉफी चांदी की बनी हुई थी, जिस पर गोल्ड प्लेटिंग थी। हालांकि, बाद में फीफा के पूर्व अध्यक्ष के सम्मान में इसका नाम बदल कर ‘जूल्स रिमट’ रखा गया।

 

1970 के बाद से बदलाव का दौर हुआ शुरू


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970 में हुए फीफा विश्व कप में ब्राजील ने जीत हासिल कीthesefootballtimes

 

1930 से लेकर 1970 तक इस खिताब का नाम ‘जूल्स रिमट’ ही रहा। 1970 में हुए फीफा विश्व कप में ब्राजील ने जीत हासिल की और वहीं से बदलाव का दौर भी शुरू हुआ। ट्रॉफी जीतने के बाद ब्राजील ने इस ट्रॉफी को बदलने का काम शुरू किया और 1974 के बाद से इसका नाम FIFA World Cup रखा गया। इस नाम का इस्तेमाल अभी तक होता आ रहा है।

 

 

इतना लगा है सोना

 

फीफा विश्व कप ट्रॉफी दुनिया के सामने पहली बार 1974 विश्व कप में लाई गई। फीफा विश्व कप की मौजूदा ट्रॉफी का डिजाइन इटली के विख्यात शिल्पकार सिल्वियो गाजानिगा ने तैयार किया है। 18 कैरेट सोने की 14.2 इंच लंबी ट्रॉफी का कुल वजन 6.175 किग्रा है।

 

 

कोई नहीं छू सकता ट्रॉफी

 

इस खिताब को विश्व कप जीतने वाली टीम और उसके कोच ही खुले हाथों से छू सकते हैं। इनके अलावा किसी को भी इसे खुले हाथों से छूने का अधिकार नहीं होता। बाकी किसी को इसे छूने से पहले हाथों में ग्लव्स पहनना अनिवार्य होता है।



 

 

फीफा विश्व कप ट्रॉफी का भार वीनस के हाथों में

 

फीफा विश्व कप ट्रॉफी के डिजाइन में दो मानव दुनिया को हाथों में लिए हुए हैं। ट्रॉफी में दिखाई देने वाले मानव ‘वीनस’ का प्रतीक हैं। वीनस को न सिर्फ ग्रीस बल्कि पूरी दुनिया में सौंदर्य, प्रेम और बुद्धि की देवी के रूप में माना जाता है। मान्यता यह है कि वीनस ने धरती को अपने दोनों हाथों में उठा रखा है।

 

 

नाजियों के डर से जूते के डिब्बे में भेजी गई

 

1938 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फीफा विश्व कप ट्रॉफी विजेता रही टीम इटली के पास थी। दूसरे विश्व युद्ध में ट्रॉफी को नाजियों के द्वारा हड़प लिए जाने के डर से इटली फीफा के वाइस प्रेसीडेंट ओटोरिनो बर्रास्सी ने चुप-चाप ट्रॉफी को एक जूते के डब्बे में डाल कर रोम भेज दिया था।

 

 

यहां सुरक्षित रखी जाती है ट्रॉफी

 

चार साल में होने वाले विश्व कप टूर्नामेंट के बीच में इस खूबसूरत ट्रॉफी को ज्यूरिख बैंक की तिजोरी में संभाल कर रखा जाता है।

 

 

चोरों के बीच भी है बेहद लो‍कप्रिय

 

फीफा विश्व कप के अब तक के 88 साल के इतिहास में 2 बार यह ट्रॉफी चोरी हो चुकी है। पहली बार 1966 में जब फीफा विश्व कप इंग्लैंड में खेला जाना था और टूर्नामेंट के शुरु होने से चार महीने पहले ट्रॉफी वेस्ट मिनिस्टर सैंट्रल हॉल में पब्लिक प्रदर्शनी के लिए रखी गई और वहां से चोरी हो गई। हालांकि, चोरी होने के सात दिन बाद ही ट्रॉफी एक गार्डन में अखबार में लिपटी पाई गई।

 

 


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फीफा की सबसे पूरानी ट्रॉफी जूल्स रिमट की 1983 में एक बार फिर चोरी हुई और इसके बाद ट्रॉफी को आज तक किसी ने नहीं देखा।

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