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31 साल पहले राष्ट्रगान गाने से किया था मना, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था इस परिवार के हक में फैसला

Published on 5 December, 2016 at 12:09 pm By

अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाए, साथ ही स्क्रीन पर तिरंगा भी दिखाया जाए। इस फैसले को लेकर लोगों की  मिली जुली प्रतिक्रिया आई।

पर क्या आपको पता है कि 1986 में केरल का एक परिवार राष्ट्रगान न गाने के अपने फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गया और फैसला भी उनके हक में सुनाया गया।


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केरल के इसी परिवार के मुख्या वी जे इमेनुल ने सुप्रीम कोर्ट के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान जरूरी करने पर अपनी बात रखी है। वी जे इमेनुल कहते हैंः

“हम लोग राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होते ही हैं। हमें इससे कोई परेशानी नहीं है। वैसे भी तब ही तो गाना है जब सिनेमा हॉल में जाएंगे।”

साथ ही आगे उन्होंने कहाः

“राष्ट्रगान गाने से उसका सम्मान करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। तमाम राष्ट्रीय प्रतीकों का भी आदर करना हमारी कर्तव्य है।”



कॉलेज के रिटायर्ड प्रोफेसर इमेनुल सात बच्चों के पिता है।

इमेनुल का परिवार 1985 में राष्ट्रगान न गाने के अपने निर्णय पर अडिग था। यह परिवार ईसाई धर्म को मानता था और ‘गॉड’ के अलावा किसी की प्रार्थना करने को राजी नहीं था।

1985 में उनके तीन बच्चे कोट्टयम जिले के एक हिंदू संगठन द्वारा चलाए जा रहे स्कूल एनएसएस हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त करते थे। एक दिन तीनों को स्कूल से इसलिए निष्कासित कर दिया गया, क्योंकि वे तीनों राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े तो होते थे लेकिन उसे गाते नहीं थे।

इन तीनों के अलावा स्कूल में ईसाई धर्म को मानने वाले अन्य 9 छात्र भी थे जिन्हें इसी वजह से स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था।


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यह बात इतनी बढ़ गई कि जिसकी गूंज संसद तक भी पहुंची। उस वक्त कांग्रेस के विधायक रहे वीसी कबीर ने यह मुद्दा विधान सभा में उठाया। वहीं, तत्कालीन शिक्षा मंत्री टीएम जैकब ने भी शिकायत की। राज्य सरकार ने जांच कमेटी बिठाई, जिसमें बच्चों द्वारा राष्ट्रगान के अपमान करने को लेकर कुछ साबित नहीं हो सका, लेकिन तीनों बच्चों को लिखित में ‘आगे से राष्ट्रगान गाएंगे’ देने को कहा गया।

कमेटी की इस बात को इमेनुल ने मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने हाई कोर्ट जाने का फैसला लिया जहां उनकी याचिका को दो बार ठुकरा दिया गया और फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

1986 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस परिवार के हक में फैसला सुनाते हुए कहाः

“इस वक्त हम कह सकते हैं कि ऐसा कहीं लिखा नहीं है कि राष्ट्रगान बजने के दौरान उसे गाना जरूरी है। अगर कोई उसके सम्मान में खड़ा हो जाता है तो उतना बहुत है।”

फैसला अपने पक्ष में आने के बाद बच्चों को दोबारा स्कूल में बुला तो लिया गया, लेकिन उस माहौल में उनका मन नहीं लगा। वह सिर्फ एक दिन ही स्कूल गए और फिर उसके बाद  दोबारा कभी स्कूल नहीं गए।

खुद इमेनुल ने भी बच्चों के स्कूल जाने पर जोर नहीं दिया, क्योंकि उनके मुताबिक अंग्रेजी के साथ अगर मौलिक ज्ञान हो तो वही पर्याप्त है।


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एक 1985 का वक़्त और एक आज का। आज इमेनुल के आठ पोता-पोती हैं, जो स्कूल तो जाते हैं, लेकिन उनमें से भी कोई राष्ट्रगान नहीं गाता। इस बारे में इमेनुल बताते है कि इन बच्चों के स्कूल में दाखिले से पहले ही स्कूल प्रसाशन को सारी बातें बता दी गई और कोर्ट का ऑर्डर भी दिखा दिया गया। अभी तक किसी तरह की कोई दिक्कत सामने नहीं आई है।

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