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समकालीन कवियों के लिए प्रेरणास्त्रोत थे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

Published on 3 August, 2016 at 1:05 pm By

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त समकालीन कवियों के लिए प्रेरणास्त्रोत रहे थे। हिन्दी कविता के विकास में उनका बहुत योगदान रहा है। वह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रभावित थे।

राष्ट्रकवि गुप्त ने आचार्य की प्रेरणा से खड़ी बोली को अपनी काव्य-रचनाओं का माध्यम बनाया। उन दिनों प्रचलित ब्रजभाषा को छोड उन्होंने खड़ी बोली को अपनी काव्य अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।


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बाद के दिनों में वह कवियों और काव्य रसिकों के लिए प्रेरणा बने। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त न केवल एक महान कवि थे, बल्कि उन्होंने कई मौलिक काव्य-नाटक भी लिखे। उनके द्वारा लिखित पांच मौलिक नाटक ‘अनघ’, ‘चन्द्रहास’, ‘तिलोत्तमा’, ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ और ‘विसर्जन’ हिन्दी साहित्य की दुनिया में उत्कृष्ट माने जाते हैं। नाटक ‘अनघ’ जातक कथा से सम्बद्ध बोधिसत्व की कथा पर आधारित पद्य में लिखा गया नाटक है। ‘चन्द्रहास’ इतिहास का आभास उत्पन्न कहता है। वहीं, ‘तिलोत्तमा’ पौराणिक काव्य-नाटक है।

इसके अलावा मैथिलीशरण गुप्त ने भास के चार नाटकों- ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘प्रतिमा’, ‘अभिषेक’, ‘अविमारक’ का अनुवाद किया है। इसमें उन्होंने वैविध्य का खासा ध्यान रखा था।



3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के झांसी में स्थित चिरगांव में जन्में मैथिलीशरण गुप्त विद्यालय से अपनी व्यावहारिक पढ़ाई पूरी नहीं कर सके थे। उन्होंने घर पर ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी के मार्गदर्शन में उन्होंने 12 वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया। वह बाद के दिनों में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए और उन्होंने खड़ी बोली में कविताओं की रचना शुरू की। उनकी ये रचनाएं मासिक पत्रिका “सरस्वती” में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।

उनका पहला काव्य संग्रह “रंग में भंग” बेहद प्रचलित हुआ और बाद के दिनों में “जयद्रथ वध” से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वर्ष 1914 में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत “भारत भारती” के प्रकाशन के बाद उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही गई। “भारत भारती” के तीन खंड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे।

वर्ष 1931 में वह राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आए। ‘यशोधरा’ वर्ष 1932 में लिखी गई। ‘यशोधरा’ के प्रकाशन के बाद गांधी जी ने उन्हें “राष्टकवि” की संज्ञा देकर संबोधित किया। वर्ष 1941 में वह सत्याग्रह कर जेल गए। भारत की स्वतंत्रता के बाद वह वर्ष 1952-1964 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। इससे पहले उन्हें आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया गया।

वर्ष 1953 में वह “पद्म विभूषण” से सम्मानित किए गए। वर्ष 1962 में उन्हें हिन्दू विश्वविद्यालय ने भी डी.लिट. से सम्मानित किया।


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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने 12 दिसम्बर 1964 को अंतिम सांस ली। अपने जीवन काल में उन्होंने दो महाकाव्य, 19 खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। हिन्दी भाषा-साहित्य में काव्य-परम्परा के प्रति अभूतपूर्व देन के लिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हमेशा याद किए जाते रहेंगे।

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