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मुट्ठीभर भारतीय जवानों ने आख़िरी सांस तक लिया था 5 हजार चीनी सैनिकों से लोहा

Updated on 2 February, 2017 at 5:34 pm By

वीरता और शौर्य की गाथाएं अक्सर हमारे ज़ेहन में ज़िंदा रहती हैं और अधिकतर हमें वही किस्से-कहानियां सुनाई जाती हैं, जहां हालात तो विपरीत होते ही हैं, साथ में जीवन का अंत निश्चित रूप से तय होता है। इतिहास भी उन्ही शूरवीरों के सम्मान में कसीदे पढ़ना पसंद करता हैं, जिन्होंने अपने साहस और हौसले से इसके पन्नों में जगह बनाई। और बात जब देशभक्ति की हो, तो इन देशभक्तों को युगों-युगों तक याद किया जाता है।

तभी हम पृथ्वीराज चौहान या टीपू सुल्तान की शहादत पर जश्न मानते हैं। शिवाजी और उनके मुट्ठी भर बहादुर साथियों को इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि उन्होने अपने अपार साहस के साथ महान सेनाओं के खिलाफ लडाइयां लड़ी थीं।

मुझे यकीन हैं कि वीरों की शौर्य-गाथाएं हमेशा लिखी जाती रहेंगी। कुछ इसी तरह की एक शौर्य गाथा का गवाह रेज़ांग ला रहा है। जी हां, 18 नवंबर 1962 को रेज़ांग ला पर 13 कुमाऊं की सी-कंपनी के वीरों के संघर्ष और अदम्य साहस की कहानी अमर है।


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चुशूल में खड़े हर एक शहादत के सम्मान में स्मारक यह प्रश्न पूछते हैं:

“एक इंसान के लिए एक बेहतर मौत क्या हो सकती है? भयभीत करने वाली मुश्किलों का सामना करते हुए या अपने पितरों के राख के लिए या फिर मंदिरों में स्थापित भगवान के लिए?”

सी-कंपनी न तो किसी राख के लिए लड़ रही थी। और न ही किसी मंदिर के लिए। और न ही उनमें से कोई चुशूल के थे। चुशूल में हार जाना लद्दाख की सुरक्षा का आख़िरी विकल्प भी नहीं था। लेकिन 1962 के काले दिनों में चुशूल देश के सम्मान का विषय बन गया था।

18 नवंबर, 1962 को लद्दाख का चुशूल इलाका पूरी तरह बर्फ से ढंका हुआ था। इस दुर्गम इलाके में होने वाली जंग दुनिया में सशस्त्र बलों के इतिहास में आखिरी सांस तक लड़े जाने वाले महानतम जंगों में से एक माना जाता है।

मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमाऊं के 120 जवानों की चार्ली कंपनी ने चुशूल एयरफील्ड पर अपनी पकड़ बना रखी थी। जो भारत के नज़रिए से लद्दाख को बचाए रखने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था।

चुशूल की इस सुबह ने बेहद ठंडी हवाओं वाली बीती रात देखी थी। इसके असर से आसमान ने भी बर्फ की हल्की बारिश शुरू कर दी, लेकिन हालात और भी बुरे होने थे। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के करीब 5,000 से लेकर 6,000 सैनिकों ने अचानक चुशूल पर हमला बोल दिया। चीनी भारी तोप और हथियारों से लैस थे।

परिस्थितियां ऐसी थी कि जिस चोटी पर चार्ली कंपनी के जवान तीन गुटों में तैनात थे, उन्हें कहीं से सहायता नहीं मिल सकती थी। दरअसल, यह भारत माता के इन 120 सपूतों के लिए इतिहास लिखने का दिन था।



मुट्ठी भर जवानो के साथ मेजर शैतान सिंह पीछे भी हट सकते थे, पर उन्हें इस दिन को इतिहास में अमर करना था। वह एक ऐसी जंग लड़ने जा रहे थे, जिसे अंतिम सांस तक चलना था। इसका परिणाम यह हुआ कि इन 120 जवानों ने करीब 1,300 दुश्मन सैनिकों को मौत के घाट सुला दिया। हालांकि, 120 में से 114 बहादुर सिपाही शहीद हो चुके थे और 6 को बंदी बना लिया गया था। पर यह वो जंग थी, जिसे कभी भुलाया नही जा सकता।

सुबह के 03:30 बजे थे, जब चीन की गोलीबारी से चुशूल धुआं-धुआं हो उठा था, लेकिन चार्ली कंपनी के जवान भी पीछे नहीं हटे। आज बात देश पर न्योछावर होने की थी। उनके पास आज जो कुछ भी था, वह देश के गौरव के लिए कुर्बान कर देना था।

मेजर शैतान सिंह, जिन्हें पराक्रम के लिए बाद में ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया, जानते थे कि वह एक हारी हुई जंग लड़ रहे हैं, लेकिन उनका इरादा आत्मसमर्पण या हार मानने का नहीं था। उन्होंने अद्वितीय वीरता के साथ अपने साथियों का नेतृत्व किया।


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यही वजह है कि कंपनी की अतुलनीय वीरता की वजह से कंपनी के कमांडर को पीवीसी के साथ अन्य पांच जवानों को वीर चक्र और चार को सेना के पदक से सम्मानित किया गया।

कैप्टन रामचंद्र यादव उन 6 जवानो में से एक थे, जो शायद इसलिए जीवित रहे ताकि इस जंग की शौर्य गाथा हम सबको सुना सके कि कैसे चीन दो बार मुंह की खाने के बाद भी अपनी क्रूरता से बाज़ नही आ रहा था? कैसे भारतीय सैनिकों के पास गोला बारूद समाप्त होने के बाद भी वे लोहा लेते रहे।

कैप्टन रामचंद्र यादव की आंखें आज भी चमक उठती हैं, जब वो याद करते हैं कि कैसे नाइक राम सिंह, जो पहलवान भी थे, अकेले ही अपने हाथों से चीनी सिपाहियों की लाशें बिछाते जा रहे थे। ऐसा तब तक चलता रहा, जब तक कि दुश्मन की गोली सिर पर लगने से वह शहीद नही हो गए। रामचंद्र यादव 19 नवंबर को मुख्यालय पहुंचे। बाद में 22 नवम्बर को उन्हें जम्मू में सेना के अस्पताल ले जाया गया।

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कैप्टन रामचंद्र यादव के संग हवलदार निहाल सिंह indianexpress

बाद में 1964 में रेज़ांग ला की लड़ाई पर आधारित एक बॉलीवुड फिल्म भी बनी, जिसका नाम ‘हक़ीक़त’ था। हालांकि इस फिल्म में कई तथ्यात्मक ग़लतियां थीं। पर जिस ढंग से इन 120 जवानों की वीरता दिखाई गई, वह रेज़ांग ला में इन जाबाज़ों के हौसले और ताक़त को चित्रित करती हैं। इस फिल्म का यह गीत आज भी हमारी आंखों को नाम कर जाता हैं।

“सांस थमती गयी नब्ज़ जमती गयी, फिर भी बढ़ते कदम को ना रुकने दिया

कट गये सर हमारे तो कुछ गम नही, सर हिमालय का हमने ना झुकने दिया

मरते मरते रहा बांकापन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों”

जी हां, देश के हरियाणा, गुड़गांव, रेवाड़ी, नारनौल और महेंद्रगढ़ जिलों से ताल्लुक रखने वाले इन सपूतों ने दुश्मन को दिखा दिया था कि यहां हर घर में एक शेर पैदा होता है, जो वक़्त आने पर देश के लिए अपनी जान भी कुर्बान कर सकता है।

यादव मानते हैं कि वह सौभाग्यशाली थे, जो इस पराक्रम का हिस्सा बन सके। वह शायद इसलिए बच गए, ताकि 120 बहादुर जांबाज़ों की वह शौर्य गाथा सुना सके, जिसकी वजह से लद्दाख आज भी भारत का अमूल्य हिस्सा है। यह हमारा कर्तव्य है कि ऐसे फौलादी जाबाज़ों को हम याद रखें और उनकी वीरता की कहानी आने वाली पीढ़ियों को बता सकें।

“थी खून से लथ-पथ काया, फिर भी बन्दूक उठाके

दस-दस को एक ने मारा,फिर गिर गये होश गँवा के

जब अन्त-समय आया तो,कह गए के अब मरते हैं

खुश रहना देश के प्यारों, अब हम तो सफ़र करते हैं”


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इन्ही पंक्तियों के साथ टॉपयॅप्स टीम समस्त शहीदों और जवानो के साहस और ज़ज़्बे को सलाम करती है। साथ ही यह आशा करते हैं हम उन शहादत को अपने जेहन में ज़िंदा रखें, जिनकी वजह से हम अपने घरों में चैन से सो पाते हैं। जय हिंद!

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