सैकड़ों भूखे मरीजों को मुफ्त में खाना खिलाते हैं हेमन्त पटेल

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2:03 pm 29 Jan, 2016

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हमारे समाज के दो चेहरे है। एक पूरी सम्पन्न है, वहीं दूसरे को भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरत को भी पूरा करने के लिए न जाने कितनी ही चुनौतियों से गुज़रना पड़ता है। आमतौर पर हम मानते हैं कि ‘भूख’ शब्द में निर्धनता, लाचारी और दुर्दशा का समावेश है। आज हम जिस व्यक्ति से आपका परिचय कराने जा रहे हैं वह असल जिन्दगी का नायक है। जी हां, हेमन्त पटेल का नाम भूख से लड़ रहे लोगों के लिए एक उम्मीद है।

Hemant Patel

हेमंत पटेल भूख और बेबसी को अपनी ज़िन्दगी में महसूस कर चुके हैं। जब उनकी बेटी एक सरकारी अस्पताल में भर्ती थी, तब उसका पेट भरने के लिए उनके पास 10 रुपए भी नही थे। उनके जैसे ही और भी लोग थे, पर हेमन्त बेबस थे।

सौभाग्य से उनकी बेटी जल्द ही स्वस्थ हो गई, लेकिन इस घटना ने हेमंत को झकझोर कर रख दिया था। धीरे धीरे सब सामान्य हो गया और हेमन्त ने केटरिंग का काम शुरू कर दिया, लेकिन दूसरी बार फिर ऐसे हालात से सामना हुआ तो उनकी ज़िन्दगी का मकसद ही बदल गया।


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दरअसल 2002 के दंगो मे अहमदाबाद जल रहा था। दंगो से प्रभावित हजारों घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा था। हेमन्त जब अपने एक मित्र से मिलने अहमदाबाद के एक अस्पताल पहुंचे, तो पिछली मार्मिक यादें फिर से ताज़ा हो गईं।

हेमंत कहते हैंः

“जब मैं अस्पताल पहुंचा तो बाहर बैठे सैकड़ों लोगों को देखा, जिनके पास न तो खाना था और न ही पैसे। इस मंज़र ने मुझे उन पुरानी यादों की तरफ धकेल दिया, जब मेरी बेटी अस्पताल में थी और उसको खाना खिलाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। उनकी यह हालत देख कर मेरा दिल भर आया और उस दिन से मैने यह निर्णय लिया कि मैं मरीजों और उनके परिजनों को को खाना खिलाऊंगा।”



तब से लेकर आज तक हेमन्त रोज़ाना वी. एस. अस्पताल के करीब 250-300 मरीज़ों के लिए खाना उपलब्ध कराते हैं। मरीज और उनके रिश्तेदारों को हेमंत का बेसब्री से इंतेज़ार होता है। हेमन्त के इस करुण स्वभाव ने अस्पताल कर्मचारियों का दिल जीत लिया है। जब कभी कोई नया मरीज़ इस अस्पताल में भर्ती होता है, तो उसे इस सुविधा के बारे में बताया जाता है। ख़ास बात यह भी है कि यह सारा भोजन हेमन्त अपने हाथ से खुद बनाते हैं।

हेमन्त कहते हैं कि महीने मरीजों को भोजन कराने में महीने में करीब 60 हजार रुपए का खर्च आता है और यह खर्च वह स्वयं वहन करते हैं। हालांकि, अभी कोई बड़ा दानदाता इनसे जुड़ा नहीं, इसके बावजूद वह इस आंकड़े को 300 से अधिक पहुंचाना चाहते हैं।

है न असल ज़िंदगी के असली हीरो! क्या कहेंगे आप भारत के इस अद्भुत सपूत के बारे में ?


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