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कभी कार मकैनिक हुआ करते थे हर दिल अजीज़ गुलजार

Published on 18 August, 2017 at 11:52 am By

कहते हैं न जिसमें हुनर होता है, उसे दुनिया की कोई ताकत कामयाब होने से नहीं रोक पाती। कुछ ऐसी ही कहानी ही हिंदी सिनेमा के सबसे मशहूर गीतकार, कवि और शायर गुलजार साहब की।


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पंजाब (अब पाकिस्तान के) झेलम जिले के एक छोटे से कस्बे दीना में कालरा अरोड़ा सिख परिवार में 18 अगस्त 1936 को जन्मे संपूर्ण सिंह कालरा (गुलजार) को स्कूल के दिनों से ही शेरो-शायरी और संगीत का शौक था। कॉलेज के दिनों में उनका यह शौक परवान चढ़ने लगा और वह अक्सर मशहूर सितार वादक रविशंकर और सरोद वादक अली अकबर खान के कार्यक्रमों में जाया करते थे। भारत विभाजन के बाद गुलजार का परिवार अमृतसर में बस गया, लेकिन गुलजार ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई का रूख किया।

मुंबई आने के बाद गुज़ारे के लिए वह वर्ली में एक गैराज में कार मकैनिक का काम करने लगे। फुर्सत के वक्त में वह कविताएं लिखा करते थे। इसी दौरान वह फिल्म से जुडे लोगों के संपर्क में आए और निर्देशक बिमल राय के असिस्टेंट बन गए। बाद में उन्होंने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी और हेमन्त कुमार के असिस्टेंट के रूप में भी काम किया।



गीतकार के रूप मे गुलजार ने पहला गाना ‘मेरा गोरा अंग लेई ले’ वर्ष 1963 मे प्रदर्शित विमल राय की फिल्म बंदिनी के लिये लिखा। उन्होंने 1971 मे फिल्म ‘मेरे अपने’ के जरिये निर्देशन के क्षेत्र मे भी कदम रखा। इस फिल्म की सफलता के बाद गुलजार ने कोशिश, परिचय, अचानक, खूशबू, आंधी, मौसम, किनारा, किताब. नमकीन, अंगूर, इजाजत, लिबास, लेकिन, माचिस और हू तू तू जैसी कई फिल्में बनाई।

राहुल देव बर्मन के संगीत निर्देशन में गीतकार के रूप में गुलजार की प्रतिभा निखरी और उन्होंन मुसाफिर हूं यारो (परिचय), तेरे बिना जिन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं (आंधी) घर जाएगी (खुशबू), मेरा कुछ सामान (इजाजत), तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी (मासूम) जैसे कई बेहतरीन गीत दिए।

गुलजार को अपने गीतों के लिये अब तक 11 बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा उन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।


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