कुल 13 साल की अपनी सैन्य सेवा में हनुमनथप्पा ने हमेशा दुर्गम परिस्थितियों वाली जगह को चुना

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Updated on 11 Feb, 2017 at 4:16 pm

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सियाचिन में 25 फुट बर्फ के नीचे 6 दिन मौत से लड़ने वाले 19 मद्रास रेजिमेंट के लांस नायक  हनुमनथप्पा ने वर्ष 2016 में 11 फरवरी को अंतिम सांस ली थी। देश का यह वीर नायक भले ही जीवन की लड़ाई हार गया, लेकिन सियाचिन में मौत से संघर्ष की उनकी कहानी देश-दुनिया के बाकी लोगों के लिए एक मिसाल बन चुकी है।

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सियाचिन ग्लेशियर में टनों बर्फ के नीचे छह दिन तक दबे रहने के बावजूद उन्हें मलबे से जीवित बाहर निकाला गया था। यह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

इस हिमस्खलन ने सियाचिन में 19,600 की ऊंचाई पर बनी भारतीय सेना की पोस्ट को चपेट में ले लिया था।


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लांस नायक को इलाज के लिए दिल्ली लाया गया था। देश में उनकी सलामती के लिए लोगों ने प्राथनाएं की। उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था और 11 फरवरी 2016 को उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना में हनुमनथप्पा सहित 10 सैन्यकर्मी जीवित दफन हो गए थे।

33 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हुए हनुमनथप्पा ने अपने कुल 13 साल की सैन्य सेवा में 10 साल सियाचिन जैसी  ही कठिन और खतरनाक जगहों पर सेवा दी थी।

कर्नाटक के धारवाड़ जिले के बेटाडुर गांव के हनुमनथप्पा 25 अक्टूबर 2002 को मद्रास रेजीमेंट की 19वीं बटालियन में शामिल हुए थे। 2003 से 2006 तक वो जम्मू-कश्मीर के माहोर में तैनात रहे। इस दौरान उन्होंने आतंकियों के खिलाफ लोहा लिया। 2008 से 2010 के दौरान एक बार फिर से जम्मू एवं कश्मीर में तैनाती लेकर उन्होंने आतंकवादियों से मुकाबलों में अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था।

2010 से 2012 के बीच उनकी तैनाती पूर्वोत्तर में हुई, जहां उन्होंने एनडीएफबी और उल्फा के खिलाफ अभियानों में अपनी हिस्सेदारी निभाई।

हनुमनथप्पा को उनके अदम्य साहस हेतु मरणोपरांत सेना पदक से सम्मानित किया गया। बहादुर सैनिक की पत्नी महादेवी अशोक बिलेबाल ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत से सेना दिवस परेड में यह पदक प्राप्त किया।

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