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सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं पद्मश्री कवि हलधर नाग, पांच छात्रों ने उनपर की है पीएचडी

Published on 30 March, 2016 at 5:28 pm By

यहां हम जिनके बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने एक अलग प्रवत्ति को जन्म दिया है। शिक्षा वह नहींं, जो सिर्फ किताब से ली गई हो। शिक्षा उस शैली का नाम है, जो इंसान अपनी खूबी, प्रतिभा को निखार कर सिद्ध करता है।

हलधर नाग, जो मुश्किल से तीसरी कक्षा तक भी नहीं पढ़े है, को वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं, उनपर पांच शोधार्थियों ने अपना PHD पूरा किया है। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या ख़ास है, उ़ड़ीसा के रहने वाले हलधर नाग में।


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66 वर्षीय हलधर नाग कोसली भाषा के प्रसिद्ध कवि हैं। ख़ास बात यह है कि उन्होंने जो भी कविताएं और 20 महाकाव्य अभी तक लिखे हैं, वे उन्हें ज़ुबानी याद हैं। अब संभलपुर विश्वविद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन ‘हलधर ग्रन्थावली-2’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। सादा लिबाज, सफेद धोती और बनियान पहने, नाग नंगे पैर ही रहते हैं।

हलधर नाग जो कुछ भी लिखते हैं, उसे याद करते हैं। आपको बस कविता का नाम या विषय बताने की ज़रूरत है। उन्हें अपने द्वारा लिखे एक-एक शब्द याद हैं। वह एक दिन में तीन से चार कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, जिनमें वह अपनी लिखी रचनाएं लोगों को सुनाते है। नाग कहते हैंः

“यह देखने में अच्छा लगता है कि युवा वर्ग कोसली भाषा में लिखी गई कविताओं में खासा दिलचस्पी रखता है।”

हलधर नाग का जन्म 1950 में बारगढ़ जिले के एक गांव में गरीब परिवार में हुआ। नाग ने मात्र तीसरी कक्षा तक ही अपनी शिक्षा ली, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तब वह महज 10 साल के थे।

पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उनकी माली हालत और बिगड़ती चली गई। उन्होंने अपने परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हुए छोटी उम्र में ही एक स्थानीय मिठाई की दुकान पर बर्तन धोने का काम किया।



करीब दो साल बाद, नाग ने एक स्थानीय उच्च विद्यालय में 16 साल तक एक बावर्ची के रूप में काम किया। नाग बताते हैंः

“वक़्त के साथ इस क्षेत्र में ज़्यादा से ज़्यादा स्कूल बनाए गए। तब मेरी मुलाकात एक बैंकर से हुई। मैंने उनसे 1000 रुपए का क़र्ज़ लेते हुए एक छोटी सी दूकान खोली, जिसमें बच्चों के स्कूल से जुड़ी, खाने की चीज़ें उपलब्ध थी।”

यही वह दौर था, जब नाग ने 1990 में अपनी पहली कविता ‘धोडो बरगच’ ( द ओल्ड बनयान ट्री) लिखी। इस कविता को उन्होंने स्थानीय पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजा। उन्होंने पत्रिका को चार कविताएं भेजी थी, और सभी रचनाएं प्रकाशित हुई।

“यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी और इस वाकये ने ही मुझे और अधिक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने अपने आस-पास के गांवों में जाकर अपनी कविताएं सुनाना शुरू किया और मुझे लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।”

उडीसा में लोक कवि रत्न के नाम से मशहूर नाग की कविताओं के विषय ज़्यादातर प्रकृति, समाज, पौराणिक कथाओं और धर्म पर आधारित होते हैं। वह अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने की ओर तत्पर रहते हैं।


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नाग कहते हैं कि मेरे विचार में कविता का वास्तविक जीवन से जुड़ाव और उसमें एक समाजिक सन्देश का होना आवश्यक है।

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