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महान क्रान्तिकारी, कवि, दार्शनिक व गुरू थे श्री अरविन्दो

Published on 5 December, 2015 at 10:57 am By

श्री अरविन्दो न केवल एक महान क्रान्तिकारी थे, बल्कि वह महायोगी, कवि, दार्शनिक, लेखक व गुरू भी थे। युवा अरविन्द घोष ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया। कालान्तर में वह योगी बन गए। उन्होंने दक्षिण भारत के पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया और श्री अरविन्दो कहलाए।

महान साधक


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योग साधना पर उन्होंने न केवल मौलिक ग्रन्थ लिखे, बल्कि वेद, उपनिषद और अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थों पर टीका भी लिखी। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेन्च, ग्रीक और इटालियन भाषाओं में निपुणता हासिल कर ली थी। यही नहीं, सिर्फ 18 वर्ष की आयु में ही वह आई.सी.एस. बन गए थे। हालांकि देश प्रेम की वजह से उन्होंने राष्ट्रसेवा को तरजीह दी।

शिक्षाविद

प्रतिभाशाली अरविन्दो को बड़ौदा नरेश ने अपनी रियाशत में शिक्षा सास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। यहां उन्होंने हजारों युवाओं को शिक्षित किया। वे अलग-अलग समय में अलग-अलग पदों पर रहते हुए अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे। नेशनल ला कॉलेज की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। मात्र 75 रुपए मासिक तनख्वाह पर उन्होंने वहां अध्यापन-कार्य किया।

क्रान्तिकारी



बंगाल के विभाजन के लिए लॉर्ड कर्जन ने जब बंग-भंग योजना बनाई तब इसके विरोध में श्री अरविन्दो ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इसी क्रम में उन्होंने क्रान्ति पत्रिका वन्देमातरम् का प्रकाशन प्रारम्भ किया। आन्दोलनकारी अरविन्दो जब कलकत्ता आए तब उन्हें राजा सुबोध मलिक के महल में ठहराया गया था। राजमहल में आवास होने की वजह से जन-साधारण उनसे मिल नहीं पाते थे। इस वजह से उन्होंने एक साधारण बस्ती में अपना बसेरा बनाया। बाद में उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया।

ब्रितानी सरकार से सीधा संघर्ष

श्री अरविन्दो के क्रान्तिकारी विचारों से ब्रितानी सरकार आतंकित थी। उन्हें वर्ष 1908 की 2 मई को उनकी टोली के युवकों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इस घटना का उल्लेख ‘अलीपुर षडयन्त्र केस’ के रूप में किया गया है। इस घटना के बाद उन्हें अलीपुर जेल में एक वर्ष तक बंदी बनाकर रखा गया।

आध्यात्म की तरफ झुकाव


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अलीपुर जेल में रहने के दौरान श्री अरविन्दो का झुकाव आध्यात्म की तरफ हुआ। बाद में उन्हें वर्ष 1909 के 6 मई को रिहा कर दिया गया। वह जनता के सामने आए। उत्तरपाड़ा इलाके में उन्होंने एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया था, जो बाद में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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