गूगल अर्थ ने मिलवाया 25 साल से बिछड़े मां-बेटे को; कहानी किसी फिल्म से कम नहीं

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Updated on 15 Dec, 2015 at 10:28 am

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कहते हैं की इस दुनिया में मां से बढ़कर खुशी और कुछ नही होती। वो लोग बहुत खुशनसीब होते हैं, जिनकी मां उनके पास होती है। लेकिन उनका क्या जो किसी कारण से अपनी मां से बिछुड़ जाते हैं? यह कहानी किसी बॉलीवुड ड्रामा फिल्म से कम नहीं है। इस कहानी में वह सबकुछ मिलेगा, जो “करन-अर्जुन” जैसी फ़िल्मों में है।

इसमें एक मासूम का मां से अलगाव है। तो दूसरे मां का प्रेम भी है। बचपन में ग़रीबी बेबसी है, तो जवानी में सफल होकर अपनी मां को पा लेने की उम्मीद भी। और अंत में बेहतरीन क्लाइमैक्स। पढ़िए असली जिन्दगी की इस कहानी को।

एक झपकी जिससे बिछुड़ गए अपने

यह कहानी है सारू मुंशी खान की जो महज 5 साल की उम्र में अपनी मां से बिछुड़ गया। खंडवा का रहने वाला सारू एक दिन अपने भाई के साथ रेलवे स्टेशन जाता है। झपकी लगने की वजह से सारू की आंख लग जाती है और वह एक बेन्च पर सो जाता है।

जब सारू की आंख खुलती है तो वह भाई को पास नहीं पाता। रोते-रोते अपने भाई की तलाश में वह स्टेशन पर ही खड़ी ट्रेन में घुस जाता है। तलाश की असफल कोशिशों के दौरान थककर वह ट्रेन के डिब्बे में ही सो जाता है। ।

अंजान शहर जहां कोई मिला अपना

सारू की नींद करीब 14 घंटे बाद खुलती है। तब तक वह कलकत्ता पहुंच चुका होता है। अंजान शहर, मां के बिछुड़ने का गम और बढ़ती भूख की आग उसे भीख मांगने पर मज़बूर कर देती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात एक और लड़के से होती है, जो उसे थाना ले जाता है। थाने में कुछ सही से न बता पाने की वजह से उसे एक स्वयंसेवी संस्था ‘इंडियन सोसाइटी फॉर स्पॉन्सरशिप ऐंड अडॉप्शन’ को सौंप दिया जाता है। कुछ दिन के छान-बीन के बाद भी संस्था उसके घर का पता नही लगा पाती है। बाद में सारू को एक ऑस्ट्रेलियाई ब्रायर्ली परिवार गोद ले लेता है।


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ऊधर. सारू के बड़े भाई का मृत शरीर पुलिस को मिलता है। सारू की मां और परिजनों को लगता है की वह भी इसी दुर्घटना में मारा गया और वे उसके लौटने की उम्मीद छो़ड़ देते हैं। उधर, सारू ऑस्ट्रेलिया पहुंच जाता है और एक आम ऑस्ट्रेलियन बच्चे की तरह उसका लालन-पोषण होने लगता है।

मां से मिलने की आस और 25 साल का इंतज़ार

25 साल बाद आख़िर वह एक दिन आ ही जाता है, जब कई सालों की उसकी गूगल अर्थ पर अपने घर की खोज सफल होती है। अपने बचपन की धुंधली यादों के सहारे वह अपने घर को खोज निकालता है। वह जहां अपने भाई से बिछुड़ा था, उस स्टेशन का पता लगा लेता है। और निकल पड़ता है अपनी मां से मिलने।

गूगल अर्थ से नसीब हुई जन्नत

सारू गूगल अर्थ की मदद से अपने घर पहुचता है। जहां कोई नही रहता है। फिर भी गां वालो को अपने बचपने की फोटो दिखाता है और पहचान करने की कोशिश करता है। उसके पड़ोसी उसे उसके मां के पास ले जाते हैं और इस तरह से एक मां का खोया लाल 25 साल बाद आकर उसे गले लगाता है।

 

गूगल अर्थ ने सारू की कहानी जानने के बाद उसके जीवन पर एक डॉक्युमेंटरी बनाई है, जो इस तरह है।

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