शर्मनाक: महाराष्ट्र बोर्ड की किताब में दहेज प्रथा की वजह बताई गई ‘लड़की का बदसूरत होना’

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Updated on 6 Feb, 2017 at 9:10 am

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ये कैसी विडम्बना है जो सरकार दहेज के खिलाफ लड़ने की तमाम बाते करती है, कानून बनाती है, उसी सरकार के अन्तर्गत देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्रों को ऐसी शिक्षा दी जा रही है जो निंदनीय है।

महाराष्ट्र बोर्ड की 12 वीं कक्षा की समाजशास्त्र की किताब में दहेज प्रथा के पीछे जो कारण बताएं हैं वो बेहद आपत्तिजनक है।

महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की समाजशास्त्र पाठ्यपुस्तक में ‘भारत में बड़ी सामाजिक समस्याएं’ शीर्षक वाले एक अध्याय में लिखा है कि अगर कोई लड़की बदसूरत या अपंग है, तो फिर वो अपने परिवार के लिए एक मुसीबत बन जाती है।

बच्चों को पढ़ाई जाने वाली यह महान किताब 6 लोगों द्वारा लिखी गई है और इसका प्रकाशन स्टेट बोर्ड ही करता है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस लेख से जो निम्न संदेश बच्चों को दिया जा रहा है उसकी सुध लेना वाला भी कोई नहीं है। इस मसले पर जब महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े से पूछा गया तो उन्होने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

किताब में आगे लिखा है कि यदि कोई लड़की बदसूरत और अशक्त है तो उसका विवाह होना बहुत मुश्किल हो जाता है। ऐसी लड़की की शादी के लिए परिवार को काफी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। बदसूरती और अपंगता की वजह से लड़की से शादी करने के लिए दूल्हा और उसका परिवार ज्यादा दहेज की मांग करते हैं। ऐसे में लड़की के माता-पिता को उनकी मांग के हिसाब से दहेज जुटाना पड़ता है। इससे समाज में दहेज प्रथा की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।


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विडम्बना देखिए कि यह घटिया सन्देश ‘भारत की सामाजिक समस्याएं’ नामक पाठ में दर्ज है। किताब में ‘कुलीन विवाह’ को भी दहेज का एक कारण बताया गया है, जिसमें एक छोटी जाति की महिला का विवाह बड़े जाति के पुरुष से होता है। किताब का कहना है कि ऐसे विवाह भव्य समझे जाते हैं इसलिए लड़के वाले ज्यादा दहेज मांगते हैं। किताब के रुख से साफ है कि वो बच्चों को दहेज के कारण बताने के बजाए, एक तरह से दहेज का औचित्य सिद्ध करने में लगी हुई है।

इतना ही नही, इस किताब में धर्म, जाति प्रथा, सामाजिक प्रतिष्ठा और मुआवजा के सिद्धांत को भी दहेज का बड़ा कारण बताया गया है।



सवाल हमारी तरफ से जायज है कि आखिर कब तक शिक्षा के नाम पर खिलवाड़ करते रहेंगे।

ऐसा यह पहली दफ़ा नही है जब स्टेट बोर्ड की किताबों में ऐसी विवादित बातें पाई गईं हो। इससे पहले पिछले ही साल राजस्थान में कक्षा 8 की किताबों में कहा गया था कि औरत का धर्म होता है कि वो अपने पति की बात माने।

वहीं इसी साल जनवरी में बंगाल की ममता सरकार ने धर्मनिरपेक्षिता के नाम पर ‘रामधेनु’- इंद्रधनुष का बंगाली नाम, को बदलकर ‘रोंगधेनु’ कर दिया। इन शिक्षा के ठेकेदारों के ऊपर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ के आरोप लगते ही रहते हैं।

ऐसे में टॉपयैप्स उन हर हथकंडे का विरोध करती है, जिसमें राजनीति के आड़ में शिक्षा पर चोट पहुंचाई जा रही है। ये घटनाएं अपने आप में बताती हैं कि कैसे सत्ता के दम पर ग़लत विचारधाराओं को बच्चों के दिमाग में भरा जा रहा है। सरकार को ऐसी शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, जिससे बच्चों का भविष्य उज्जवल हो और देश का भी।


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