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उत्तराखंड का ‘घुघुतिया त्यौहार’; कौओं को खिलाया जाता है स्वादिष्ट पकवान

Updated on 25 January, 2016 at 8:13 pm By

कुमाऊं में मनाए जाने वाले घुघुतिया त्योहार की अलग पहचान है। उत्तराखंड में इसे मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। त्यौहार का मुख्य आकर्षण कौआ है। बच्चे इस दिन बनाए गए घुघुते कौआ को खिलाकर कहते हैंः


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“काले कावा काले घुघुति मावा खाले”

 इस त्योहार में आख़िर कौआ क्यों हैं मुख्य आकर्षण?

कुमाऊ में चन्द्र वंश के राजा कल्याण चंद के कोई संतान नही थी। इस वजह से मंत्री राजा के बाद ख़ुद को राज्य का उत्तराधिकारी मानता था।

बाघनाथ के मन्दिर मे प्रार्थना के बाद राजा रानी को पुत्र धन मिला, जिसका नाम निर्भय चन्द्र रखा गया। उन्हें उनकी मां प्रेम से ‘घुघुति’ पुकारती थीं।

घुघुति एक मोतियों की माला पहनता था, जिससे उसे बहुत लगाव था और जब वह अपनी किसी बात को मनवाने के लिए ज़िद करता, तो उसकी मां उसे यह कह कर शांत करती थी की अगर उसने जिद किया तो वह माला कौवे को दे देंगी। वह कहती थींः

“काले कौआ काले घुघुति माला खाले”

इस तरह से बालक घुघुति शांत हो जाता था। किंतु इस प्रकरण में बहुत से कौए इकट्ठे हो जाते थे, जिसे हर बार रानी कुछ खाने को दे देती थी। इस तरह से बालक घुघुति की एक कौए से दोस्ती हो गई।



राजगद्दी के लालच में एक दिन मंत्री ने षड्यंत्र रचा और घुघुति को उठा कर चुपचाप जंगल की तरफ निकल गया। मंत्री की ऐसी करतूत देखकर घुघुति का मित्र कौआ ज़ोर-ज़ोर से कांव कांव करने लगा, जिससे बहुत से कौए इकट्ठे हो गए और मंत्री के ऊपर मंडराने लगे।

मौका पाकर मित्र कौए ने घुघुति का माला झपट लिया और जाकर नगरवासियों को सूचित कर दिया। उधर कौओं ने मंत्री पर हमला कर दिया| जिससे जान बचा कर मंत्री घुघुति को अकेला जंगल मे छोड़ कर निकल गया।

 

माला की पहचान कर राजा-रानी ने घुड़सवारों के साथ मिल कर कौए का पीछा किया। कौआ उड़ कर एक डाल पर बैठ गया, जिसके नीचे घुघुति सो रहा था। पुत्र को पा कर राजा-रानी आत्मविभोर हो गए। तब महल लौट कर रानी ने खूब ढेर सारे पकवान बनवाए और घुघुति से आग्रह किया की इन पकवानों को अपने मित्र कौओं को खिला दे|

घुघुति ने कौओं को बुलाकर खाना खिलाया। यह बात धीरे-धीरे कुमाऊं में फैल गई और इसने बच्चों के त्यौहार का रूप ले लिया। तब से हर साल इस दिन धूम धाम से इस त्यौहार को मानते हैं। मीठे आटे से यह पकवान बनाया जाता है, जिसे घुघूत नाम दिया गया है। इसकी माला बना कर बच्चे मकर संक्रांति के दिन अपने गले में डाल कर कौओं को बुलाते हैं और कहते हैंः

“काले कावा काले घुघुति माला खाले” ||
“लै कावा भात में कै दे सुनक थात”||
“लै कावा लगड़ में कै दे भैबनों दगड़”||
“लै कावा बौड़ मेंकै दे सुनौक घ्वड़”||
“लै कावा क्वे मेंकै दे भली भली ज्वे”||


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इसके लिए एक कहावत भी मशहूर है कि श्राद्धों में ब्राह्मण और उत्तरायनी को कौए मुश्किल से मिलते हैं।

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