बेटे की जीत से पूरा हुआ ‘बॉक्सर पिता’ का सपना

Updated on 1 Sep, 2017 at 3:44 pm

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अक्सर माता-पिता अपने अधूरे सपने अपने बच्चों की आंखों में संजोने लगते हैं और सोचते हैं कि जो काम वो नहीं कर पाए वो उनके बच्चे करेंगे। बॉक्सर धर्मेंद्र बिधूड़ी के साथ भी कुछ ऐसा हुआ। धर्मेंद्र तो बॉक्सिंग में लगातार हार के बाद इस खेल से अलग हो गए, लेकिन अब उनके बेटे ने हैमबर्ग में आयोजित वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में पहुंचकर पिता के सपनों को जीत दिलाई है।

दरअसल, जब धर्मेंद्र बिधूड़ी 17 की उम्र में अपना पहला क्वार्टर फाइनल मैच हारे थे, तब उन्हें ये नहीं पता था कि हार का ये सिलसिला लंबे समय तक चलेगा। लगतार कई हार के बाद 1990 उनका बॉक्सिंग करियर खत्म हो गया। उसी साल उनकी शादी भी हो गई। बहुत कम स्पोर्ट्सपर्सन हैं जो शादी के बाद अपना करियर बचा पाते हैं। यदि वो मेनस्ट्रीम स्पोर्ट्स में ना हो, तो करियर बचाना और मुश्किल हो जाता है। कुछ ऐसा ही धर्मेंद्र के साथ भी हुआ।

फिर 5 साल बाद, 1995 में दिल्ली के सरिता विहार में उन्होंने बिधूड़ी बॉक्सिंग क्लब की स्थापना की। खास बात ये है कि इसी बॉक्सिंग क्लब उनके बेटे ने अपने बॉक्सिंग के सफ़र की शरुआत की। अब धर्मेंद्र के बेटे गौरव बिधूड़ी हैमबर्ग में आयोजित वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में पहुंच गए हैं। ऐसा करने वाले वो देश के चौथे बॉक्सर हैं। गौरव की इस जीत ने धर्मेंद्र की सारी हार को भुला दिया।


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गौरव का कहना हैः

‘मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है कि मेरे पापा ने मुझ पर विश्वास किया। क्वार्टर फाइनल के मैच में थोड़ा प्रेशर था, पर कोच सर से बात कर के आत्मविश्वास लौट आया। अब मैं अपने मेडल का रंग बदलना चाहता हूं।’

सेमीफाइनल में गौरव का मुक़ाबला अमेरिका के ड्यूक रैगेन से होगा। 10 साल की उम्र में गौरव ने पहले स्टेट-लेवल टूर्नामेंट में हिस्सा लिया था। वर्ष 2006 में वे सब-जूनियर नेशनल चैंपियन बने। वर्ष 2011 में उन्होंने नेशनल गेम्स में कांस्य पदक हासिल किया था। अब उनके पिता को बेटे से एक और जीत की उम्मीद है।

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