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जानिए क्यों कहते हैं, ‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’

Published on 13 January, 2017 at 8:25 pm By

एक बेहद चर्चित लोकोक्ति है, ‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’। गंगासागर मेला सदियों से भारतीय जनमानस में रचा-बसा रहा है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गंगासागर की चर्चा मोक्षधाम के तौर पर होती रही है। गंगोत्री से निकलने वाली पवित्र गंगा पश्चिम बंगाल से होते हुए अपने अंतिम पड़ाव पर जहां सागर में जाकर मिलती है, उस स्थान को ही गंगासागर के नाम से जानते हैं। बंगाल के दक्षिण 24 परगना में स्थित इस स्थान को सागरद्वीप भी कहते हैं।

इस साल यहां करीब 20 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों के आने की उम्मीद है, जिसमें 10 लाख से अधिक लोग तो मकर संक्रान्ति के दिन डुबकी लगाएंगे।

गंगासागर जाने के लिए कोलकाता पहुंचने वाले तीर्थयात्री। फोटोः संदीप ठाकुर


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हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, साल की 12 संक्रांत‌ियों में मकर संक्रांत‌ि का सबसे महत्व ज्यादा है। कहते हैं, इस द‌िन सूर्य मकर राश‌ि में आते हैं और इसके साथ देवताओं का द‌िन शुरू हो जाता है, जो देवशयनी एकादशी से सुप्त हो जाते हैं।

इस तीर्थस्थल का आकर्षण कपिल मुनि का मंदिर है। कपिल मुनि के बारे में मान्यता है कि उन्होंने भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार किया था। भारतीय मान्यताओं के मुताबिक, यहां मकर संक्रांति पर पुण्य-स्नान करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।



‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’ नामक लोकोक्ति के पीछे मान्यता यह है कि यहां आना हर किसी के नसीब में नहीं होता। इसका कारण यहां आवागमन की सुचारू व्यवस्था नहीं होना था। यही वजह है कि गंगासागर की यात्रा को सैकड़ों तीर्थयात्राओं के बराबर माना जाता रहा है। हालांकि, अब परिवहन और अन्य संचार साधनों की वजह से यहां पहुंचना आसान है।

मकर संक्रांति के पावन अवसर से करीब एक सप्ताह पहले ही यहां मेला लगना शुरू हो जाता है। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और साधु-संत आते हैं। इस मेले को कुम्भ मेला के तुल्य माना गया है।

फोटोः संदीप ठाकुर

फोटोः संदीप ठाकुर

फोटोः संदीप ठाकुर

कोलकाता के बाबूघाट में लगा है मिनी गंगासागर मेला

गंगासागर जाने से पहले तीर्थयात्री कोलकाता के बाबूघाट में ठहरते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले तीर्थयात्री बाबूघाट के विभिन्न कैम्प्स में ठहरकर अपने आगे की यात्रा पर निकलते हैं। इस दौरान विभिन्न स्वयंसेवी संगठन तीर्थयात्रियों की सेवा कर धर्मलाभ करते हैं।


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सोर्सः सुनो

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