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सिर्फ़ 23 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए थे युवा क्रांतिकारी राजगुरु

1:44 pm 24 Aug, 2017

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भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंह के साथ ही राजगुरु ने भी युवाओं मे जोश भरने का काम किया था। 24 अगस्त 1908 को पुणे जिले के खेड़ा गांव में जन्में राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च,  1931 को फांसी दी गई थी। इन तीनों युवा क्रांतिकारियों का बलिदान देश कभी भूल नहीं पाएगा।

राजगुरु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे।

वर्ष 1919 में जलियांवाला बाग में जनरल डायर के नेतृत्व में किए गए भीषण नरसंहार ने राजगुरु को बहुत आहत किया। इस घटना के बाद ही राजगुरु ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बागी और निर्भीक हो गए। उन्होंने तभी प्रतिज्ञा ली कि वो भारत को विदेशियों के हाथों से आजाद कराके ही रहेंगे चाहे इस काम में उनकी जान ही क्यों न चली जाए और राजगुरु ने आखिरकार अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

राजगुरु की बचपन से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में रुचि थी। उन्होंने 19 दिसंबर, 1928 को शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक पद पर नियुक्त अंग्रेज अधिकारी जेपी सैन्डर्स को गोली मार दी थी और ख़ुद को अंग्रेजी सिपाहियों से गिरफ्तार कराया था। यह सब पहले से बनाई गई योजना के मुताबिक ही थी।


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अदालत में इन क्रांतिकारियों ने स्वीकार किया था कि वे पंजाब में आजादी की लड़ाई के एक बड़े नायक लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेना चाहते थे। लाला लाजपत राय की मृत्यु अंग्रेजों के विरुद्ध एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से हो गई थी।

राजगुरु ने भगत सिंह के साथ मिलकर सैन्डर्स को गोली मारी थी और 28 सितंबर, 1929 को एक गवर्नर को मारने की कोशिश की थी, जिसके अगले दिन उन्हें पुणे से गिरफ्तार कर लिया गया। 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे लाहौर के केंद्रीय कारागार में उनके दोस्तों भगत सिंह और सुखदेव के साथ उन्हें भी फांसी पर लटका दिया गया।

शहीद राजगुरु के जन्मदिन पर उनको शत-शत नमन।

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