अब जाकर मिला कारगिल युद्ध के इस हीरो को इंसाफ, लोगों के जूठे बर्तन मांझने को था मजबूर

Updated on 18 Sep, 2018 at 2:15 pm

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सैनिक अपनी जान की परवाह किए बगैर वतन की सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। देश के प्रति उनकी सेवा ही हमें सुख-चैन की जिंदगी प्रदान करती है। जवानों की मुश्तैदी के कारण ही हम आम नागरिक अपने जीवन को सुचारू रूप से चला पाते हैं। लेकिन सिस्टम की चूक से उन्हें कई बार आहात होना पड़ता है। उनकी भावनाओं को चोट पहुंचती है जो बेहद दुःखद है। कारगिल युद्ध में जान की बाजी लगाने वाले योद्धा सतवीर सिंह की मुफलिसी आपको चकित कर सकती है।

 

फ़ौजी सतवीर सिस्टम की गलती की वजह से जूस बेचने पर मजबूर हुए। हालांकि, सरकार ने इसे संज्ञान में ले लिया है।

 

 

गौरतलब है कि कारगिल युद्ध के दौरान दिल्ली के सतवीर सिंह को लड़ते हुए गोली लगी जो आज भी उनके पैर में फंसी हुई है। आज उन्हें चलने के लिए बैशाखी का सहारा लेना पड़ता है। विडंबना है कि वे जीविका के लिए जूस की दुकान चलाते हैं क्योंकि उन्हें पेंशन की पूरी राशि किसी चूक की वजह से नहीं मिल रही थी। इन्होंने 13 साल 11 महीने नौकरी की और सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। शुरुआती सरकारी मदद इन्हें ऑफर हुई थी लेकिन वो एक-एक कर इनसे ले ली गई। सिस्टम में कहां गड़बड़ी हुई, कोई बताने वाला नहीं था।


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सतवीर सिंह ने कारगिल के बाद सरकारी सिस्टम से लड़ने का फैसला किया। उन्होंने इस बावत लगभग 10 हजार पत्र लिखे। मीडिया में जब ये खबर आई तो सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। लिहाजा रक्षा मंत्रालय ने इस मामले को खंगाला और इन्हें तीन लेटर भेजे गए, जिसमें शुरू से अब तक मंजूर पेंशन का ब्योरा, उनके अकाउंट में पहुंची आधी-अधूरी रकम का विवरण है। पत्र में ये भी लिखा है कि अब उन्हें अगले महीने से पूरे 42 हजार रुपये की पेंशन मिलेगी। इसके साथ ही पिछले कुछ साल से आधी अधूरी पेंशन का 14 लाख रुपये एरियर भी उन्हें शीघ्र मिल जाएगा।

 

सतवीर का मामला राज्यसभा में उठा और उन्हें आखिरकार उनका हक मिला। ये सोचने वाली बात है कि सरहद पर जान जोखिम में डालने वाले फौजियों के साथ ऐसी लापरवाही आखिर क्यों! ये लाजमी है कि सतबीर सिंह अकेला इस लचरपन के भुक्तभोगी नहीं होंगे। उनका क्या होगा जिनपर न मीडिया लिख रहा है और न राज्यसभा में मुद्दा बनाकर उठाया जा रहा है।

 

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