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मोरारजी देसाई की गलतियों की वजह से पाकिस्तान बना था परमाणु सम्पन्न देश

Published on 7 March, 2016 at 9:28 pm By

इतिहास हमेशा वैसा ही नही होता, जैसा हमें पढ़ाया जाता है। इसके लिखे जाने और फिर उसको रटाने तक, सत्य को कई अग्नि-परीक्षाओं से गुज़रना पड़ता है। वह परीक्षा चाहे किसी के गुण-गान करने की हो या फिर तथ्यों को छुपा देने की। भारतीय इतिहास के लेखन में कई बार साक्ष्यों को दरकिनार कर दिया गया।

आइए आज इतिहास के उन पन्नों को खंगालते हैं, जिन्हें वैसा नहीं होना था, जैसा कि वे आज दिखते हैं। उस इतिहास को जानने की कोशिश करते हैं, जिसकी वजह से पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति तो बना ही, साथ ही भारत के ख्याति प्राप्त ख़ुफ़िया नेटवर्क रॉ के द्वारा पड़ोसी देश में काम पर लगाए गए जासूसों को चुन-चुन कर मारा गया था।

मोरारजी देसाई संग पाकिस्तान का जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक

मोरारजी देसाई संग पाकिस्तान का जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक


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इस प्रकरण में मुख्य भूमिका निभाने वाले जिस व्यक्ति पर मैं चर्चा करने जा रहा हूं, उन्हें स्वयं को ‘सर्वोच्च नेता’ कहलवाना पसंद था। वह अखंड भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले अंग्रेजी राज में नौकरशाह थे। वह भारत के उन महान नेताओं में से हैं, जिनके योगदान को इतिहास में अतुलनीय बताया जाता है। उस वक्त कई कलमकारों ने उनकी प्रशंसा में स्याही और ऊर्जा खत्म की।

यह वही ‘महान’ नेता हैं, जिनकी मदद से पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति बन गया। जी हां, वही एकमात्र भारतीय हैं, जिन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से सम्मानित किया गया। यह और कोई नही, भारत के छ्ठे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे।

क्या आप विश्वास करेंगे कि साउथ ब्लॉक में बैठे भारत के प्रधानमंत्री खुफिया नेटवर्क की अहम जानकारी अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से साझा कर सकते हैं? लेकिन 1978 में ऐसा हुआ।

वर्ष 1974 के बाद से देश में राजनीतिक हालात कुछ ऐसे बने कि जनता पार्टी, इंदिरा गांधी और उनकी समर्थित कांग्रेस का देश से सफ़ाया करने को कृतसंकल्प नज़र आई। 23 मार्च 1977 को 81 वर्ष की अवस्था में मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने। उनकी विश्वसनीय खुफिया एजेन्सी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) से नहीं बनती थी। दरअसल, उनके मन में यह धारणा थी कि आपातकाल के दौरान, रॉ प्रमुख रामनाथ काओ और उनके सहयोगियों ने विपक्षी नेताओं को तोड़ने में इन्दिरा गांधी की मदद की थी।

फिर जो कुछ मोरारजी देसाई ने किया वह रॉ और भारत के इतिहास के पन्ने पर एक काला धब्बा ही है

देसाई ने सबसे पहले रॉ के बजट में 50 प्रतिशत तक कटौती कर दी, जिससे नाराज़ होकर इस एजेंसी के प्रमुख रामनाथ काओ अवकाश पर चले गए। काओ दुनिया भर के नेताओं में बेहद लोकप्रिय थे। उनके प्रशंसकों में जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भी थे, जो उस समय सीआईए के निदेशक थे।

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रामेश्वर नाथ काव बायें से दूसरे जिन्होने रॉ के स्थापना की blogspot

1970 के दशक में भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु शक्ति हासिल करने की होड़ लगी थी। इन्दिरा गांधी के शासन के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की जा रही परमाणु तकनीकी से पाकिस्तान भयभीत था। 1974 मे पाकिस्तान ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में अपनी पहली परमाणु बम परियोजना- 706 की शुरुआत की। रॉ ने फिर खुद को एक बार बेहतर साबित करते हुए पाकिस्तान के इस गोपनीय परमाणु संबंधित परियोजना की जानकारी एकत्रित कर ली और इस पूरी परियोजना को अपने रडार में ले लिया।

लेकिन यह जानकारी इकट्ठा करना रॉ के लिए इतना आसान नहीं था, क्योंकि यह परियोजना रावलपिंडी के कहुटा इलाक़े में था। इस पूरे इलाक़े को बेहद गोपनीय रखा गया था। रॉ एजेंटों ने बहुत ही कुशलता से कहुटा के समीप ही एक बाल काटने वाले सैलून पर नज़र रखना शुरू किया और उन वैज्ञानिकों के बाल के नमूने उठाए, जो परमाणु परियोजना से जुड़े हुए थे।

नमूनों के वैज्ञानिक परीक्षण के बाद जो परिणाम मिले, वे बेहद चौंकाने वाले थे। उन नमूनों में उच्च रेडियेसन और बम बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले यूरेनियम की मौजूदगी का पता चला। अब यह साबित हो चुका था कि पाकिस्तान परमाणु गतिविधियों में शामिल है। यही नही रॉ एजेंटों ने मुखबिर की भी तलाश कर ली, जो कुछ रिश्वत के बदले में पाकिस्तानी परमाणु परियोजना का ब्लू प्रिंट मुहैया करने को तैयार था।

रॉ पाकिस्तान के परमाणु परियोजना को विफल करने से कुछ ही कदम दूर था। अब समस्या यह थी कि रिश्वत के रूप में जो विदेशी मुद्रा (पाकिस्तानी मुद्रा) उपलब्ध होना था, वह नियम अनुसार बिना प्रधानमंत्री के सहमति से संभव नही हो सकता था।

जब सुंटूक (तत्कालीन रॉ प्रमुख) अनुमति के लिए देसाई के पास गए, तो देसाई ने यह दलील देकर साफ इन्कार कर दिया कि पड़ोसी राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना ग़लत है।



उस दौर में मुहम्मद जिया-उल-हक जो पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगने के बाद वहां का जनरल पद संभाल रहा था, उसकी घनिष्टता देसाई से थी। मोरारजी देसाई अक्सर ही फोन पर जिया-उल-हक से सांसारिक विषयों और राजनीतिक विवादों पर चर्चा करते रहते थे। शायद देसाई इस बात से अवगत नही थे कि जिया बहुत ही चतुराई से भारत की खुफिया गतिविधियों की जानकारी पता करने के लिए उन्हें फंसा रहा था। यह सब देसाई के समझ से परे था।

इतना ही नहीं, उन्होंने वह ग़लती की, जिसे कम से कम भारत के इतिहास में तो नहीं ही होना चाहिए था। उन्होंने जिया-उल-हक को एक फोन वार्ता में रॉ नेटवर्क के पाकिस्तान में विस्तार के साथ यह भी जानकारी दे दी कि भारत सरकार को पता है कि कहुटा में वे गुप्त परीक्षण की तैयारी में लगे हैं।

जैसे ही इस महत्वपूर्ण जानकारी का खुलासा हुआ, जिया तुरंत सक्रिय हुआ और भारतीय ख़ुफ़िया नेटवर्क के खिलाफ जाल बिछा दिया। पाकिस्तान में मौजूद रॉ एजेंटों की उसने सुचारू रूप से हत्या करवाई। सिर्फ़ देसाई की एक ग़लती (दरअसल बेवकूफी) की वजह से भारतीय जासूस जो इतने सालों से पाकिस्तान में अपना नेटवर्क बनाने में सफल हुए थे, उन्हें दर्दनाक और गुमनाम मौत का सामना करना पड़ा।

उसी दौरान, इजरायल के विदेश मंत्री मोशे डायन भारत दौरे पर थे। उन्होंने पाकिस्तान में हो रही परमाणु गतिविधियों पर चर्चा करने के लिए देसाई से एक गुप्त बैठक की। इजरायल के विदेश मंत्री मोशे डायन ने यह प्रस्ताव रखा कि वो कहुटा पर हवाई हमला करने में सक्षम हैं। बस उन्हे ईंधन की पूर्ति के लिए अपने विमानों को भारत में उतारना पड़ेगा। इस प्रस्ताव को स्वीकारने से इन्कार कर दिया। दोनों ही प्रकरण भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी के अभिलेखों में दर्ज़ हैं।

क्या देसाई सीआईए के लिए मुखबिर थे? जिसके लिए उन्हे भुगतान किया जाता था?

पुलित्जर पुरस्कार विजेता और खोजी पत्रकार सेमूर हर्ष, जिन्हें अपनी पुस्तक ‘माई लाइ मैसकर’ से ख्याति प्राप्त है, की 1983 में प्रकाशित “दी प्राइस ऑफ पावर: किसिन्जर इन दी निक्सन वाइट हाउस” में लिखा है कि “मोरारजी देसाई वास्तव में एक सीआईए के मुखबिर थे। 1971 के भारत-पाक गतिरोध के दौरान सीआईए को महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए उन्हें सालाना 20,000 डॉलर भुगतान किया जाता था।

शायद यह देसाई के समझ से परे होगा कि एक जासूस देशभक्त के लिए सबकुछ त्याग कर अपने दुश्मन मुल्क में जीवन व्यतीत करना और वहां की विपरीत परिस्थितियों में खुद को ढाल कर अहम जानकारियां निकलवाना कितना कठिन होता है। एक चूक कितनी भारी पड़ सकती है। देसाई ने वह सबकुछ किया जिसकी वजह से खुफिया विभाग की नज़रों में तो खलनायक बने ही, साथ ही उनकी एक ग़लती की वजह से पड़ोसी दुश्मन देश पाकिस्तान खुद को सामरिक परमाणु राज्य बनाने में सफल रहा।

रॉ के एक जासूस मोहनलाल भास्कर ने अपनी पुस्तक ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ में देसाई के रॉ से मनमुटाव और गैर-जिम्मेदराना रवैए का एक वाकया लिखा है। दरअसल मोहनलाल भास्कर रॉ की तरफ से पाकिस्तान में लगाए गए थे। परमाणु बम की कुछ अहम जानकारी भारत को जारी करने के दौरान उन्हें पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया था। बाद में करीब 14 साल तक पाकिस्तान की जेलों में अमानवीय अत्याचार और यातना झेलने के बाद उन्हें रिहा किया गया। दरअसल, कैदियों की अदला-बदली में उन्हें वहां के नारकीय जीवन से मुक्ति मिली।

तब मोहनलाल भास्कर नवनियुक्त प्रधानमंत्री देसाई के पास गए और मुआवजे की मांग की। मोहनलाल का मानना था कि एक जासूस, जिसको सुरक्षा मामले की वजह से सब कुछ त्यागना पड़ता है और जब वह इतनी यातनाएं झेलने के बाद अगर भारत वापस आता है, तो उसे मुआवजा तो मिलना ही चाहिए ताकि वह आगे की ज़िंदगी बिता सके।

परंतु उम्मीद, सत्ता के मोह में अंधों से नही की जा सकती देसाई ने एक बार फिर खुद की जीर्ण मानसिकता को दर्शाया। इस पुस्तक के मुताबिक, उन्होंने कहाः

“पाकिस्तान में तुम्हारे द्वारा की गई ग़लतियों के लिए हम क्यों भुगतें।”

मोहनलाल को यह जवाब अचंभित करने वाला लगा। वह अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि “अगर उस वक़्त मेरे हाथ में बंदूक होती तो मैं उन्हें गोली मार देता।”

देसाई के इन अचंभित करने वाले फ़ैसलों पर विशेषज्ञ दो गुटों में बंटे हैं। एक तबका यह कहता है कि वह गांधी की विचारधारा से काफ़ी प्रभावित थे, जिस वजह से कठोर फ़ैसले लेने में वह हमेशा असहज रहें। किंतु प्रश्न यह है कि आंतरिक और सीमा की सुरक्षा को लेकर उनके किए गए ये फ़ैसले क्या वाकई देश के लिए हितकर रहे?


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दूसरा मत यह है कि उनकी संकीर्ण मानसिकता की वजह से रॉ उन्हें नहीं भाता था। लेकिन क्या उनका यह वर्ताव उचित था ?

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