इन 5 गांवों की वजह से हुआ था महाभारत का युद्ध, आज भी है इनका अस्तित्व

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Updated on 23 Jul, 2018 at 5:21 pm

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महाभारत युद्ध से जुड़े तमाम प्रसंग काफी प्रसिद्ध हैं। महाभारत युद्ध होने का कोई एक कारण नहीं था। ये आम धारणा है कि लालच, स्त्री के अपमान जैसे कई कारण महाभारत युद्ध होने की वजह बने। इन्हीं में से जमीन और राज्य का बंटवारा भी युद्ध होने की एक बड़ी वजह बना। जमीन के लालच में कौरवों ने कई षड्यंत्र रचे। यहां तक कि इसके लिए पांडवों को मारने तक की साजिश रची गई।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर दुर्योधन पांडवों की एक बात मान लेता तो महाभारत का युद्ध शायद होता ही नहीं।

 

 

हुआ कुछ यूं कि जुएं में पांडव इन्द्रप्रस्थ सहित सबकुछ हार गए, भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ और अंतत: उनको 12 वर्ष का वनवास मिला। वनवास काल में कई राजाओं से पांडवों ने मित्रता कर अपनी शक्ति को बढ़ाया और आखिरकार अपना सम्मान और हक वापस पाने के लिए कौरवों से युद्ध करने का निश्चय किया।

 

 

हालांकि, धर्मराज युधिष्ठिर शान्तिपूर्वक इस मसले को हल करना चाहते थे। कौरवों द्वारा अपमान सहने के बावजूद वह उनसे संधि करना चाहते थे। क्योंकि वह जानते थे कि अगर युद्ध हुआ तो उससे कई वंश तबाह हो जाएंगे।

 

पांडवों ने युद्ध को टालने की हर संभव कोशिश की। उन्होंने कौरवों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि अगर वह पांच गांव उनको दे देते हैं तो वे हस्तिनापुर की राजगद्दी पर अपना दावा छोड़ देंगे। पांडवों के राजदूत बनकर खुद भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर इस प्रस्ताव को लेकर पहुंचे। उन्होंने सबके समक्ष इस संधि प्रस्ताव को रखा, लेकिन दुर्योधन नहीं माना।

 

 

दुर्योधन ने अपने पिता को संधि प्रस्ताव स्वीकार करने से रोकते हुए कहा कि ये पांडवों की चाल है। दुर्योधन भरी सभा में बोला कि पांडव हमारी विशाल सेना से डर गए हैं, इसलिए केवल 5 गांव मांग रहे हैं और अब यह युद्ध होकर ही रहेगा।

 

इस पर वहां खड़े श्रीकृष्ण बोलते हैंः

“पांडव शांतिप्रिय हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वे युद्ध के लिए तैयार नहीं हैं। वे बस कुल का नाश होते नहीं देखना चाहते। दुर्योधन मैं तो केवल इतना चाहता हूं कि तुम पांडवों को आधा राज्य लौटकर उनसे संधि कर लो। अगर ये शर्त तुम मान लो तो पांडव तुम्हें युवराज के रूप में स्वीकार कर लेंगे।”


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लेकिन धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, मां गांधारी और गुरु द्रोण के समझाने पर भी हठी दुर्योधन पांच गांव भी पांडवों को देने को तैयार नहीं हुआ। परिणामस्वरूप अपना हक पाने के लिए पांडवों को युद्ध के मैदान पर उतरना पड़ा।

 

जानिए कौन से थे वो पांच गांव, जो अगर पांडवों को दे दिए जाते तो शायद खूनी महाभारत युद्ध नहीं होता। बता दें कि ये  गांव आज भी अस्तित्व में है।

इन्द्रप्रस्थ

 

महाभारत में इंद्रप्रस्थ का उल्लेख कहीं-कहीं पर श्रीपत के नाम से मिलता है। जब पांडवों और कौरवों के बीच संबंध खराब हो गए थे तो धृतराष्ट्र ने यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ क्षेत्र को पांडवों को देकर अलग कर दिया था। यह क्षेत्र बड़ा ही दुर्गम था। यहां की जमीन भी उपजाऊ नहीं थी, लेकिन पांडवों ने इस उजाड़ क्षेत्र को आबाद कर दिया। इसके बाद पांडवों ने रावण के ससुर और महान शिल्पकार मायासुर से विनती कर यहां सुंदर नगरी बसाई, जिसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा गया। मौजूदा समय में दिल्ली का दक्षिणी इलाका महाभारत काल का इंद्रप्रस्थ माना जाता है।

व्याघ्रप्रस्थ

 

महाभारत काल के व्याघ्रप्रस्थ को आज बागपत कहा जाता है। इस जगह को मुगलकाल से बागपत कहा जाने लगा। आज ये जगह उत्तर प्रदेश में स्थित है। कहा जाता है कि इसी जगह पर दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाकर पांडवों को मारने की साजिश रची थी।  लाक्षागृह एक भवन था, जिसे दुर्योधन ने पांडवों के विरुद्ध एक षड्यंत्र के तहत उनके ठहरने के लिए बनाया था। इसे लाख से निर्मित किया गया था, ताकि पांडव जब इस घर में रहने आएं तो चुपके से इसमें आग लगा कर उन्हें मारा जा सके।

स्वर्णप्रस्थ

 

स्वर्णप्रस्थ का तात्पर्य ‘सोने के शहर’ से है। महाभारत का स्वर्णप्रस्थ आज सोनीपत के नाम से जाना जाता है। समय के साथ महाभारत का स्वर्णप्रस्थ, ‘सोनप्रस्थ’ बना और फिर सोनीपत कहलाया। आज ये हरियाणा का एक प्रसिद्ध शहर है।

पांडुप्रस्थ

 

महाभारत काल में आज के पानीपत को पांडुप्रस्थ कहा जाता था। इसी पानीपत के पास कुरुक्षेत्र स्थित है, जहां महाभारत का युद्ध  हुआ था। पानीपत, नई दिल्ली से 90 किलोमीटर उत्तर में है।

तिलप्रस्थ

 

तिलप्रस्थ नाम का यह गांव आज तिलपत के नाम से जाना जाता है। यह हरियाणा के फरीदाबाद जिले का एक कस्बा है।

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