समाज के दुःख-दर्द को ग़जलों से बयां करते थे फ़िराक़ गोरखपुरी

Updated on 28 Aug, 2017 at 9:29 am

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“देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है”

जन सरोकार, संवेदना और समाजिकता की बात करने वाला वो शाइर और दूसरा न होगा। जी हां! हम बात कर रहे हैं फ़िराक गोरखपुरी की, जिन्होंने आज के ही दिन 1896 को गोरखपुर में जन्म लिया था। रामकृष्ण की कहानियों में दिलचस्पी लेने वाला रघुवीर सहाय कब लोगों के रूहों से भावनाओं के जरिए तारतम्य बैठाने लगा, किसी को नहीं मालूम। बस इतना पता है कि वो आया था जग को जग से जोड़ने, उर्दू शायरी में भारत की आत्मा पिरोने।


फिराक गोरखपुरी मेधावी छात्र रहे थे। उनकी शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई थी। उन्हें आई.सी.एस. में चुना गया था, लेकिन वे स्वराज्य आन्दोलन में कूद पड़े और जेल भी गए। फिर बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1930 से लेकर 1959 तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे। फ़िराक अपनी शायरी के लिए जाने जाते हैं। गज़ल कहने का उनका अंदाज एकदम से नया और आधुनिक था, लिहाजा उन्हें शुरुआत में सफलता नहीं मिली। फिराक गोरखपुरी की गजलों को लोगों ने देर से स्वीकारा लेकिन जब एक बार लोग उनको पढ़ने और सुनने लगे तो फिर लोगों ने उनको सर आंखों पर बैठा लिया।


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फ़िराक गोरखपुरी अंग्रेजी की अपनी कक्षाओं में भी अक्सर गज़ल पढ़ाते मिल जाते थे। वह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से अपनी नजदीकी के लिए भी फिराक जाने जाते हैं। गोरखपुरी जो एक बार ठान लेते थे, वो करते थे। उनकी निराला से खूब बनती थी।

उन्हें ‘गुले-नग्मा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार के साथ-साथ सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। उन्हें साहित्य अकादेमी का सदस्य भी मनोनीत किया गया था। भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में अप्रतिम देन के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

संकलित

फिराक ने अपनी गजलों में लोक भाषा के शब्दों को पिरोया तो साथ ही परम्परागत शैली से हटकर लिखने का दुःस्साहस किया। गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचनाओं ने फिराक साहब को अमर कर दिया। उन्होंने उर्दू रचनाओं को लोक भाषाओं से जोड़ कर उसमें नई रंगत पैदा करने का काम किया है।

आइए उनकी कुछ नज्में यहां पढ़ते हैं।

वो उठ भी चुके कब के वो जा भी चुके कब के
दिल है कि फिराक अब तक दामन को छुड़ाए है।

एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं।

किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नों इश्क धोखा है सब मगर फिर भी।

हो जिन्हें शक, वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं।

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं
तुझे, ऐ जिंदगी, हम दूर से पहचान लेते हैं।

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