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जब भारत के पहले सेनाध्यक्ष करिअप्पा ने पाक राष्ट्रपति को सिखाया देशभक्ति का पाठ

Published on 15 May, 2017 at 3:08 pm By

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा भारतीय सेना के प्रथम कमांडर-इन-चीफ थे। के एम करिअप्पा ने साल 1947 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। वह भारतीय सेना के उन तीन अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गयी। देश के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा का 15 मई 1993 में निधन हुआ था।


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फील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी, 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर हुआ था। भारतीय सैन्य इतिहास में करिअप्पा का नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित है। आइए आज यानी उनके पुण्यतिथि के दिन उनकी देशभक्ति से जुड़े प्रसंग को जानते हैं।

“अब वो मेरा बेटा नहीं, भारत मां का लाल है।”

बात 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की है। तब करिअप्पा सेवा-निवृत्त हो चुके थे। इस युद्ध में उनके बेटे केसी नंदा करिअप्पा भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट की पदवी संभाल रहे थे। युद्ध के दौरान नंदा को पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्ध बंदी बना लिया। उस वक़्त पूर्व सेना प्रमुख जनरल अयूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। देश के बंटवारे से पहले अयूब खान केसी करिअप्पा के अधीन सेवाएं दे चुके थे और उनको बहुत मानते थे।

अयूब को जब पता चला कि करिअप्पा के बेटे को युद्धबंदी बना लिया गया है, तो उन्होंने तुरंत करिअप्पा को फोन लगाया और उनके बेटे के सुरक्षित होने की ख़बर दी। अयूब ने ये भी पेशकश की कि अगर वो चाहें तो उनके बेटे को रिहा किया जा सकता है। यह पेशकश सुनकर करिअप्पा ने जो उत्तर दिया वह उनके सच्चे देशभक्त होने का प्रमाण है। करिअप्पा ने कहा-

‘अब वो मेरा बेटा नहीं, भारत मां का लाल है। उसे रिहा करना तो दूर किसी तरह की सुविधा भी मत देना। उसके साथ आम युद्धबंदियों की तरह बर्ताव किया जाना चाहिए। आपने मुझे फोन किया, इसके लिए शुक्रिया, लेकिन मेरी आपसे गुजारिश है कि सभी युद्ध बंदियों को रिहा कर दीजिए या किसी को भी नहीं।”

पाकिस्तान से लौटने के बाद नंदा करियप्पा (तस्वीर में सबसे पीछे) और वायुसेना के दूसरे अधिकारी एयर चीफ़ अर्जन सिंह के साथ.bbci



बहरहाल, युद्ध समाप्त होने के बाद नंदा को रिहा कर दिया गया था। लेकिन करियप्पा का देश के प्रति प्रेम और बलिदान की यह गाथा सदियों तक याद की जाएगी।

भारतीय सेना की काबिलियत का अंदाज़ा दिला कर प्रधानमंत्री का मन मोहा

बात 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद की है, तब सेना की कमान ब्रिटिश सेना अधिकारी सर फ्रांसिस बूचर के ही हाथों में थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, कमान भारतीय हाथों में सौंपने को लेकर चिंतित थे।


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नेहरू को यह संदेह था कि इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए भारतीय सेना अधिकारी के पास अनुभव नही है। वे इस पक्ष में थे कि अभी कुछ सालों के लिए सेना की कमान ब्रिटिश जनरल के हाथों में ही रहने दी जाए। ऐसे में करियप्पा ने यह कह कर नेहरू को चिंता मुक्त करवाया-

“सर अनुभव तो हमें देश का प्रधानमंत्री बन कर देश चलाने का भी नहीं था, लेकिन आप सफलतापूर्वक यह कार्य कर रहे हैं, तो फिर आपको जनरल के.एम. करिअप्पा की काबिलियत पर संशय क्यों है?”

प्रधानमंत्री ने तब निर्णय किया और 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बूचर से जनरल के.एम. करिअप्पा के हाथों में आ गई, तभी से इस दिन यानी 15 जनवरी को ‘सेना दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।


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ऐसे देशभक्त फील्ड मार्शल करियप्पा के हम भारतवासी सदा आभारी रहेंगे। टॉपयाप्स टीम करियप्पा के कुशल नेतृत्व और हौसले को सलाम करती है।

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