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अहिल्याबाई होल्कर: एक साहसी योद्धा और कर्मठ रानी

Published on 5 March, 2019 at 10:16 pm By

“ईश्वर ने मुझ पर जो ज़िम्मेदारी सौंपी है, मुझे उसे निभाना है। प्रजा को सुखी रखने व उनकी रक्षा का भार मुझ पर है। सामर्थ्य व सत्ता के बल पर मैं जो कुछ भी यहां कर रही हूं, उस हर कार्य के लिए मैं ज़िम्मेदार हूं, जिसका जवाब मुझे ईश्वर के समक्ष देना होगा। यहां मेरा अपना कुछ भी नहीं, जिसका है मैं उसी को अर्पित करती हूं। जो कुछ है वह उसका मुझ पर क़र्ज़ है, पता नहीं उसे मैं कैसे चुका पाउंगी।” ये शब्द देश की उस महान शासिका के हैं, जिसने अपने पराक्रम से कई पुरुष शासकों को ललकारा और उन्हें कुटनीतिक तौर पर झुकने को मजबूर कर दिया।


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यहां हम बात कर रहे हैं महारानी अहिल्याबाई होल्कर की, जिन्होंने अपने शौर्य से दुश्‍मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। सन 1725 में जन्मीं अहिल्याबाई का जन्म महाराष्ट्र के चोंडी गांव में हुआ। उनका जीवन-यापन एकदम सरल था। लेकिन उन्हें क्या पता था, जल्द ही उनका भाग्य उन्हें उस राह पर ले जाने वाला है, जहां उनके हाथों में एक राज्य की पूरी बागड़ोर होगी।

 

 

ये उस वक़्त की बात है जब देश में मुगलों के शासन का विस्तार कम हो रहा था और मराठाओं की शक्ति प्रबल हो रही थी। इस दौर में ही पेशवा बाजीराव ने अपने कुछ भरोसेमंद सेनापतियों को छोटे-छोटे राज्यों का स्वतंत्र कार्यभार सौंप दिया। इन्हीं में से एक नाम था मल्हारराव होल्कर, जिनका तेजस्व बड़ा ही पराक्रमी थी। मल्हारराव होल्कर को मालवा की ज़िम्मेदारी मिली और तब उन्होंने राज्य की स्थापना कर इंदौर को अपनी राजधानी बनाया।

कहा जाता है मल्हारराव जितने शौर्यवान थे, उनके पुत्र खंडेराव उनकी तरह पराक्रमी नहीं थे। उनका राज्य से जुड़े कामों में मन भी नहीं लगता था। मल्हारराव अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। वो अपने बेटे के लिए ऐसी पत्नी चाहते थे, जो उनके पुत्र खंडेराव के साथ-साथ पुरे राज्य को संभाल सके।

एक बार मल्हारराव कहीं गए हुए थे और रात का समय भी हो गया था। इसलिए उन्होंने पास के ही चौन्दी गांव में ठहरने का फ़ैसला किया। वहां एक मंदिर में वो जा पहुंचे। जहां उन्होंने देखा 10 से 12 साल की एक लड़की मधुर आवाज़ में आरती गा रही है। वो लड़की और कोई नहीं, अहिल्याबाई ही थीं।


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मल्हारराव अहिल्याबाई की आवाज़ से इतने प्रभावित हुए, उन्होंने उनके बारे में वहां खड़े एक व्यक्ति से पूछा, ये बच्ची कौन है? इसपर वो व्यक्ति जवाब देता है, “ये हमारी अहिल्या है, लगता है आप यहां नए आए हैं, भला अहिल्या को कौन नहीं जानता। ये मान्कोजी शिंदे की बिटिया है।” इसके बाद मल्हारराव ने अहिल्या के पिता से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की और वो व्यक्ति उन्हें मान्कोजी शिन्दे के पास ले गया। पहले तो मान्कोजी उन्हें पहचान ही नहीं पाए और जैसे ही मल्हारराव ने पेशवा का सेवक कहकर अपना परिचय उन्हें दिया, उनकी आंखें चमक उठी। उन्होंने मल्हारराव को रात को अपने घर रुकने का न्योता दे दिया। मल्हारराव ने इस आदर सत्कार को स्वीकार किया और रात को मान्कोजी शिंदे के यहीं रुकने को राज़ी हो गए।



इसके बाद शिंदे ने अपनी बेटी अहिल्या का परिचय मल्हारराव से कराया। उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और सब घर की और निकल पड़े। उन्हें अहिल्या का चरित्र, स्वरूप इतना भाया कि उन्होंने मन ही मन अहिल्या को अपनी पुत्रवधू बनाने का निश्चय कर लिया। घर पहुंचने के बाद मल्हारराव ने रात के भोजन के दौरान अहिल्या को अपने घर की बहू बनाने का प्रस्ताव शिंदे के सामने रखा। ये सुनकर शिंदे गदगद तो हुए ही साथ ही हैरान भी, उन्होंने शादी के लिए हां कह दी।

तो इस तरह अहिल्या होल्कर परिवार की बहू बनी। अहिल्या के जीवन में अब जो कुछ भी घटित होने वाला था, वो आगे चलकर स्वर्णिम अक्षरों में उनकी शौर्य गाथा का बखान करने वाला था। वो अपने ससुराल में सबकी चहेती बन गईं। सास की देखभाल से लेकर घर की ज़िम्मेदारी संभाल ली और ससुर मल्हारराव के साथ मिलकर वो राजपाठ भी देखने लगीं।

 

 

इस बीच अहिल्याबाई को एक बेटे और एक बेटी की मां बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी अचानक एक युद्ध में उन्होंने पति खाण्डेराव होल्कर को खो दिया। इस घटना से वो इतनी टूट गई कि वो सति होना चाहती थीं। तभी ससुर मल्हारराव उनके पास आए, उन्हें ये कहकर समझाया कि “अब तू ही मेरा बेटा है। तो अगर चली गई तो मैं क्या करूंगा। अपने पिता समान ससुर की आंखों में आंसू देख अहिल्या ने दिल में पत्थर रख ससुर की बात मान ली।

इसके बाद अहिल्या ने ससुर मल्हारराव के साथ मिलकर राजपाठ का काम संभाल लिया। कुछ समय बाद मल्हारराव भी वीरगति को प्राप्त हो गए। अहिल्या के लिए ये घड़ी कई चुनौतियों से भरी हुई थी। उनके कंधों पर पूरे राज्य की ज़िम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने पुत्र का राजतिलक कर उसे राजगद्दी सौंपी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। उनका बेटा बीमार रहने लगा और उसका भी निधन हो गया। ये ऐसा वक़्त था जब उनके राज्य को चलाने के लिए कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं बचा था। इस दुःख की घड़ी में राज्य और प्रजा की भलाई के लिए वो अपने आंसू पी गई और एक बार फिर उसी जोश के साथ राजपाठ में लग गईं। अब जैसा की होल्कर परिवार के पास उसका कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था, कई आस-पास के राज्य मालवा को हथियाने की सोचने लगे। इसकी भनक अहिल्याबाई को लग गई और उन्होंने फिर खुद राजगद्दी पर बैठने की घोषणा कर दी।

 

 

1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं। उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर पद पर नियुक्त किया। अहिल्याबाई के पराक्रम का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं उन्होंने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वो न केवल एक साहसी योद्धा थीं, बल्कि एक बेहतरीन तीरंदाज भी थीं। वो हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थीं। उन्होंने अपने राज्य को हर बुरी नज़र से सुरक्षित रखा।


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प्रजा के साथ उनका रिश्ता बेहद गहरा था। वो उनकी समस्याएं सुनती थी। उन्होंने अपने कालखंड (1767-1795) में कई ऐसे काम किए कि लोग आज भी उनका नाम लेते हैं। उन्होंने अपने कार्यों से अपने साम्राज्य को समृद्ध बनाया। उनकी महानता और सम्मान में भारत सरकार ने 25 अगस्त 1996 को उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया। अहिल्याबाई के जीवन से जुड़ी ये कहानी हर किसी के लिए प्रेरणा है।

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