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महाभारत की 10 प्रसिद्ध कहानियां

Updated on 14 September, 2015 at 2:39 pm By

महाभारत हिन्दुओं का एक प्रमुख महाकाव्य है। यह कृति प्राचीन भारत के इतिहास की एक गाथा है, जिसमें राजा भरत अौर अन्य भारतवंशियों के चरित्रों के साथ-साथ कई महान ऋषियों, चन्द्रवंशी-सूर्यवंशी राजाओं के उपाख्यानों सहित कई अन्य धार्मिक उपाख्यान भी निहित हैं। महाभारत की एक कहानी में कई कहानियों का समावेश हैं। हम यहां महाभारत की उन 10 कहानियों का जिक्र करेंगे, जो बेहद प्रसिद्ध हैं।

1. अभिमन्यु और चक्रव्युह


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अभिमन्यु महाभारत के एक प्रमुख पात्र हैं। वह अर्जुन के पुत्र और कृष्ण के भांजा थे। अभिमन्यु अदम्य वीरता और युद्धकला में अपने पिता के समान थे। 18 दिन चले महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु 12 दिन तक लड़ते रहे थे। अभिमन्यु का शौर्य ऐसा था कि कौरवों की सेना में एकमात्र पितामह भीष्म उनका मुकाबला कर सकते थे। अभिमन्यु को घेरने के लिए युद्ध के 13वें दिन गुरू द्रोणाचार्य ने चक्रव्युह की रचना की। अभिमन्यु चक्रव्युह में प्रवेश गए और कौरवों की सेना में भारी तबाही मचाई। लेकिन वह चक्रव्युह को भेद कर बाहर नहीं निकल सके। कौरवों ने अनैतिकता का सहारा लेते हुए एकजुट होकर निर्दयता से अभिमन्यु का वध कर डाला।

 

2. हिडिम्बा और भीम

हिडिम्बा मनुष्यों को खाने वाली राक्षसी थी, जिसने पांडव भाइयों को मारने की कोशिश की। लेकिन भीम ने उससे लड़ाई की और अपने भाइयों को बचा लिया। बाद में भीम ने उसकी बहन हिडिम्बी से विवाह रचा लिया। कालान्तर में हिडिम्बी ने घटोत्कच नामक पुत्र को जन्म दिया, जिसने महाभारत के युद्ध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

3. अर्जुन और चिड़िये की आंख


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यह महाभारत की एक प्रसिद्ध कहानी है। बाल्यकाल में जब कौरव और पांडव बालक अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा ले रहे थे, तभी गुरू द्रोण ने उन्हें एक चिड़िये पर निशाना लगाने के लिए कहा। द्रोणाचार्य ने सभी से पूछा कि उन्हें क्या दिखाई दे रहा है। सभी ने अलग-अलग जवाब दिए। किसी ने कहा वृक्ष, किसी ने चिड़िया तो किसी ने जवाब दिया आसमान। लेकिन अर्जुन ने कहा कि उन्हें सिर्फ चिड़िये की आंख दिखाई दे रही है। यह कहानी हमें इस बात की सीख देती है कि जीवन में अपने लक्ष्य को पाने के लिए दृष्टि का होना महत्वपूर्ण है।

 

4. द्रौपदी विवाह

द्रौपदी का विवाह इस महाकाव्य की एक महत्वपूर्ण घटना है। द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री के लिए एक स्वंयवर रचाया था, जहां द्रौपदी से विवाह के इच्छुक राजा-महाराजाओं एवं राजकुमारों को एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करनी थी। स्पर्धा में सभी प्रतिभागियों को ऊपर अक्ष के साथ घूमती हुई एक मछली की आंख को उसके प्रतिबिम्ब को नीचे जल में देखकर निशाना साधने के लिए कहा गया था। महाभारत के एक महत्वपूर्ण पात्र कर्ण जो इस प्रतिस्पर्धा को जीत सकते थे, द्रौपदी से विवाह के इच्छुक थे। लेकिन द्रौपदी ने यह कहकर उनसे विवाह से इन्कार कर दिया कि वे सूतपूत्र हैं। कर्ण नाराज होकर स्वयंवर से निकल गए। उनके बाद एकमात्र अर्जुन ही बचे थे, जो जल में मछली का प्रतिबिम्ब देखकर इसकी आंख को बेध सकते थे।

 

5. दुर्योधन का अपमान

द्रौपदी द्वारा दुर्योधन का अपमान महाभारत की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना है। इसे एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाता है, जिसने कौरवों और पांडवों के बीच में दूरियां बढ़ाईं। यही दूरी अंततः महाभारत के युद्घ का कारण बनी। कहानी कुछ इस तरह है कि द्रौपदी के लिए एक नए महल का निर्माण कराया गया था, जिसमें काफी कौशल का इस्तेमाल किया गया था। दुर्योधन उस महल की दीर्घा से गुजर रहे थे, जहां फर्श पर इस चालाकी से जल-कुंड बनाया गया था कि देखने में फर्श ही लगे। दुर्योधन पानी में गिर पड़े। द्रौपदी यह देख रही थी। दुर्योधन के पानी में गिरते ही, वह हंसने लगीं। उन्होंने दुर्योधन का मजाक उड़ाते हुए कहा कि अंधे का बेटा अंधा ही होता है। दुर्योधन इस घटना से चिढ़ गए।

 



6. एकलव्य की कथा

एकलव्य महाभारत का एक प्रमुख पात्र है। वह द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखना चाहता था। गुरू द्रोण ने उसे इस विद्या को सिखाने से मना कर दिया, क्योंकि वह सिर्फ क्षत्रियों को ही अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देते थे। एकलव्य ने निश्चय किया कि वह महान धनुर्धारी बनेगा। इसलिए प्रेरणा के तौर पर उसने गुरू द्रोण की मिट्टी की एक प्रतिमा बना ली और खुद ही तीरंदाजी सीखने लगा। इसी क्रम में वह धनुर्विद्या में इतना निपुण हो गया कि अर्जुन को मात दे सकता था। जब द्रोणाचार्य को इसका पता चला तो उन्होंने एकलव्य से गुरू-दक्षिणा के तौर पर उसका अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने इसे सहर्ष स्वीकर कर लिया और अंगूठा गुरू द्रोणाचार्य को दे दिया। हालांकि इसके बाद वह फिर कभी धनुष-वाण का इस्तेमाल नहीं कर सका था।

 

7. कर्ण

कर्ण को महाभारत के केन्द्रीय किरदारों में से एक माना जाता है। कर्ण कुन्ती पुत्र थे और उनका जन्म भगवान सूर्य के आशीर्वाद से हुआ था। कुन्ती को यह भय था कि लोगों को उनके बच्चे के बारे में पता चलेगा तो अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि इस बच्चे को उन्होंने विवाह पूर्व जन्म दिया था। बच्चे के जन्म लेते ही लोकलाज से बचने के लिए उन्होंने उसे एक टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया। बच्चा बाद में अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिला, जिन्होंने उसे पाल-पोस कर बड़ा किया। भगवान सूर्य के वरदान की वजह से कर्ण का जन्म कवच और कुंडल पहने हुआ था। कर्ण एक महान योद्धा थे और अर्जुन की बराबरी के धनुर्धारी भी। कर्ण को दानवीर भी कहा गया है। कहा जाता है कि मांगने वाला उनके द्वार से खाली हाथ वापस नहीं आता था।

 

8. द्युत क्रीड़ा

द्युत क्रीड़ा महाभारत का महत्वपूर्ण प्रसंग है। द्युत क्रीड़ा में पांडव राज-पाट सहित अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। यहां तक कि वह अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगाते हैं। दुर्योधन के मामा शकुनी की चालाकी से वह एक बार भी जीत नहीं पाते। महाभारत के इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि जुआ और इस तरह का व्यसन किसी के लिए भी उचित नहीं होता।

 

9. अश्वत्थामा का वध

महाभारत में गुरू द्रोणाचार्य का मारा जाना भी एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। गुरू द्रोण एक महान योद्धा थे और उन्हें तब तक युद्ध में हरा पाना संभव नहीं था, जब तक कि वह खुद शस्त्र का त्याग न कर दें। इसलिए पांडवों ने योजना बनाई कि उन्हें कहा जाए कि उनका बेटा अश्वत्थामा युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। जबकि वास्तविकता यह थी कि भीम ने अश्वत्थामा नामक एक हथी को मार गिराया था। युधिष्ठिर ने गुरू द्रोण को जाकर कहा कि अश्वत्थामा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। युधिष्ठिर सत्यवादी के रूप में ख्याति-प्राप्त थे। द्रोण के लिए उनकी बात पर विश्वास न करने का कोई कारण नहीं था। उन्होंने अपने शस्त्र त्याग दिए। दरअसल यह योजना भगवान कृष्ण ने बनाई थी।

 

10. गीता का सार

महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग गीता का सार है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है। इसमें एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है। इसमें देह से अतीत आत्मा का निरूपण किया गया है। गीता का दर्शन महान दर्शन है। जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं में उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उसके पश्चात जीवन के समरांगण से पलायन करने का मन बना लेता ह। उसी तरह अर्जुन जो महाभारत का महानायक है अपने सामने आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गया है। अर्जुन की तरह ही हम सभी कभी-कभी अनिश्चय की स्थिति में या तो हताश हो जाते हैं और या फिर अपनी समस्याओं से उद्विग्न होकर कर्तव्य विमुख हो जाते हैं। गीता में कहा गया है कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए। फल की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

 


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