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भारतीय अदालतों में चले 10 दिलचस्प मुकदमें, जिन्होंने व्यवस्था को झकझोर दिया

Updated on 26 February, 2017 at 7:56 pm By

भारत की अदालतों में अनेकों दिलचस्प मुक़दमे चले हैं। हालांकि, सभी मुक़दमें अपने आप में अलग हैं, लेकिन कुछ चीजें इनमें सामान्य हैं। हम जिन मामलों का यहां जिक्र करने जा रहे हैं, वे व्यवस्था की खामियों को उजागर करते हैं। पहचान से लेकर भ्रष्टाचार तक कई ऐसे न्यायिक मामले हैं जो बेहद दिलचस्प हैं और आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे।

1. चन्द्रशेखर प्रसाद के कत्ल का मामला

चन्द्रशेखर प्रसाद उर्फ कॉमरेड चंदू ने अपना राजनीतिक सफ़र एक विद्यार्थी के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया लिबरेशन के साथ शुरू किया और जल्द ही वह एक युवा राजनीतिक चेहरे के रूप में तेज़ी से उभरे।

वह भारत में राजनीतिक परिदृश्य को बदलना चाहते थे। लेकिन 31 मार्च 1997 को बिहार के सिवान जिले में एक बड़ी रैली के दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।


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यह मामला 15 साल लंबा खिंचा। आखिरकार 3 शार्प-शूटर को उम्रकैद की सज़ा मिली, जिनका सम्बन्ध दबंग राजनेताओं से था।

2. आजाद हिन्द फौज का मुकदमा

सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1942 में जापान के सहयोग से आजाद हिन्द फौज का गठन किया था। उद्देश्य था भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाना।

आजाद हिन्द फौज में मुख्यतः वे जवान शामिल थे, जिन्हें जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बंदी बना लिया था। इस सैन्य संगठन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला डाली थी। हालांकि, ब्रिटिश सरकार की चालाकी की वजह से आजाद हिन्द फौज अधिक समय तक उन पर दबाव नहीं बना सकी थी। फौज से जुड़े सभी मुख्य लोगों पर विद्रोह और राजद्रोह जैसे मुक़दमें लगा दिए गए।

आजाद हिन्द फौज के मामले की सुनवाई को रेड फोर्ट ट्रायल्स के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि पहला कोर्ट मार्शल नवम्बर 1945 को लाल किले में किया गया था। कुल मिलाकर नवम्बर 1945 से लेकर मई 1946 तक 10 मुकदमों पर फैसले हुए थे। ये भारतीय इतिहास के सबसे दुर्लभ मुक़दमे हैं, क्योंकि जिस समय मुकदमों की सुनवाई की जा रही थी, लोग तिरंगे झंडे के साथ मुस्लिम लीग का हरा झंडा लेकर अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ भारी मात्रा में सड़क पर उतर आए थे।

गद्दारी और साजिश के गंभीर आरोपों के बावजूद लोगों ने एकजुट होकर इन बहादुर लोगों का राष्ट्रीय नायकों की तरह समर्थन किया।

3. जेसिका लाल क़त्ल का मुकदमा


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30 अप्रैल 1999 की सुबह दिल्ली में रहने वाली एक 34 वर्षीया युवती की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। क़त्ल की वजह एक मामूली शराब की बोतल थी।

दिल्ली के महरौली इलाके में चल रही एक पार्टी के दौरान रात 1:30 बजे के करीब कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के पुत्र मनु शर्मा ने, जेसिका लाल से शराब की बोतल मांगी। जेसिका ने उसे बताया कि रात के 12:30 बजे के बाद शराब देना नियम के खिलाफ है। मनु शर्मा ने जेसिका को 1 हजार रुपए देने की कोशिश की, जो उसने लेने से इन्कार कर दिया। बात बढ़ गई तो मनु शर्मा ने अपनी पिस्तौल निकालकर दो गोलियां चला दीं, जिनमें से एक गोली जेसिका के सिर पर लगी और उसकी वही मौत हो गई।

कई पेशियों के बाद आखिरकार मनु शर्मा को दोषी पाया गया और 20 दिसम्बर 2006 को उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।

4. शाह बानो मामला

शाह बानो का मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के विवादास्पद मुकदमों में से एक है। वर्ष 1978 में 62 वर्षीया शाह बानो अपने शौहर से मिले तलाक की वजह से अदालत पहुंची।

इन्दौर की रहने वाली शाह बानो पांच बच्चों की मां थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और उसके पति को हर महीने रख-रखाव का खर्च देने का आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड विधान की धारा 125 के तहत बिना किसी जाति या धर्म के आधार पर यह फैसला दिया था। इस मुकदमें में दिलचस्प मोड़ तब आया, जब मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इस फैसले का विरोध किया और इसको शरिया कानून के ख़िलाफ़ बताया।

आखिरकार मुस्लिम समुदाय के विरोध की वजह से वर्ष 1986 में कांग्रेस सरकार ने जल्दबाज़ी में मुस्लिम महिला कानून बनाया, जिसके तहत किसी भी मुस्लिम महिला से उसके रख-रखाव का हक छीन लिया गया। शाह बानो की आखिरकार हार हुई।

5. उत्तर प्रदेश का भूमि अधिग्रहण मामला

यह मामला राजनीति से जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रेटर नोएडा के कई गांवों में सस्ती कीमतों पर जमीन खरीद ली। स्थानीय लोगों को सब्जबाग दिखाया गया कि यहां औद्योगिक विकास होगा और जिन लोगों ने अपनी जमीनें दी हैं, उन्हें कारखानों में नौकरी दी जाएगी। हालांकि, ऐसा कभी नहीं हुआ। राज्य सरकार ने इन जमीनों को बिल्डरों को बेच दिया, ताकि वे फ्लैट बनाकर लोगों को बेच सकें।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे धोखा बताया और उत्तर प्रदेश सरकार को मुआवजा देने के लिए कहा।



6. राम मंदिर का मामला

इस मुक़दमे की जड़ें धर्म, राजनीति से लेकर इतिहास तक में समाई हुई हैं। यह विवाद अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली से संबंधित है।

6 दिसम्बर 1992 को राम मंदिर समर्थकों ने बाबरी मस्जिद को विध्वंश कर दिया। इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था। मस्जिद तोडे़ जाने की वजह से दंगे भड़क गए। आखिरकार इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में केस दर्ज किया गया। इस विवादास्पद मामले में कोर्ट का फैसला 18 साल बाद आया।

अदालत के फैसले के तहत कुल 2.77 बीघा ज़मीन को तीन हिस्सों में बांट दिया गया, जिसमें से एक हिस्सा हिन्दू महासभा को राम मंदिर बनाने के लिए दिया गया, दूसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को और तीसरा हिस्सा निर्मोही आखाड़े को दिया गया।

7. सत्यम मामला

कॉरपोरेट दुनिया में घोटाला कोई नई बात नहीं है, लेकिन कुछ घोटाले बेहद खतरनाक होते हैं। सत्यम का घोटाला उन घोटालों में से एक है।

बड़ी आईटी कम्पनी सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज ने अपने निवेशकों के सपनों को तब चकनाचूर कर दिया, जब इसने घोषणा की थी कि कम्पनी ने 14 हजार करोड़ रुपए का बड़ा घोटाला किया है। 7 जनवरी 2009 को सत्यम के चेयरमैन रामालिंगा राजू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

बाद में टेक महिन्द्रा ने सत्यम को पुनः स्थापित किया और यह कंपनी 25 जून 2013 के बाद से महिन्द्रा सत्यम कहलाई।

8. के.एम. नानावती बनाम बॉम्बे हाई कोर्ट

यह केवल एक मामूली सा क़त्ल का मुकदमा है, जिसे किसी भी हालत में दुर्लभ नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस मुकदमें का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है। इस केस की वजह से पंचायती न्याय प्रणाली को रद्द किया गया।

नानावती जो एक नौसेना कमांडर थे, को अपनी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा के क़त्ल में गिरफ्तार किया गया। नानावती को मीडिया और जनता का समर्थन मिला और इस वजह से उन्हें पंचायत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया। उन्होंने 8-1 से इस मुक़दमे को जीत लिया। हालांकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने बाद में हस्तक्षेप करते हुए, नानावती को प्रेम आहूजा के क़त्ल का दोषी बताया और उम्रकैद की सजा भी सुनाई।

इस केस ने इस बात से पर्दा उठा दिया कि पंचायती अदालतें आमतौर पर सामजिक धारणा और विश्वासों को ही न्याय का आधार मानती हैं।

9. लाल बिहारी पहचान मुकदमा

इस मुक़दमें ने सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार की पोल खोल दी थी, खासकर उत्तर प्रदेश में। लाल बहादुर जो एक छोटा किसान था, उसे सरकारी दस्तावेज में मृत घोषित कर दिया गया था।

लाल बिहारी को अपनी मृत्यु का पता तब चला, जब वह एक बैंक में कर्ज लेने गया था। हताश लाल बहादुर ने हार नहीं मानी और पूरी ताक़त के साथ अपनी पहचान पाने के लिए लड़ाई शुरू कर दी। वह कोर्ट गया और उसने अपने नाम के आगे “मृतक“ जोड़ लिया। उसने अपने भाई को अगवा कर लिया, जिसने उसकी जायदाद हड़प ली थी। उसने भारतीय संसद में भी घुसने की कोशिश की थी। यही नहीं, लाल बिहारी ने अपनी पत्नी को विधवा पेंशन दिलाने की मांग भी की। बाद में उसने उन सभी लोगों के नाम जमा किए जो सरकारी आकंड़ो में मृत घोषित कर दिए गए थे। 18 साल की लम्बी लड़ाई के बाद आखिरकार आजमगढ़ के जिला अधीक्षक ने उसे जीवित घोषित किया।

लाल बिहारी को न केवल उसकी पहचान वापस मिली, बल्कि उसकी मेहनत से उसकी ज़मीन और जायदाद भी मिल गई।

10. 2G स्पेक्ट्रम घोटाला

इस मामले में कानून के रखवालों ने कानून को तोड़ने का काम किया। इसे भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला कहा जाता है।

इस घोटाले में मंत्रियों ने सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलकर “फ्रीक्वेन्सी एलोकेशन लाइसेंस” गैरकानूनी रूप से मोबाइल फ़ोन कंपनियों को बांट डाले। हालांकि, सरकार अपने बचाव में यह कहती रही कि “पहले आओ और पहले पाओ” के हिसाब से लाइसेंस बांटे गए और कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। सीबीआई जांच के दौरान खुलासा हुआ कि कुल 3,09,845.5 करोड़ का घोटाला किया गया।

इस केस में सुप्रीम कोर्ट के 2 फ़रवरी 2012 के फैसले के साथ यह पुख्ता हो गया कि लाइसेंस असंवैधानिक रूप से बांटे गए थे। इस के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने कुल 122 लाइसेंस भी रद्द कर दिए, जिन्हें 2008 में बांटा गया था। ए. राजा उस समय संचार मामलों के मंत्री थे। इस मामले में मुख्य दोषी भी वही हैं।


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